24 घंटे की बादशाहतआखिरकार भारतीय क्रिकेट टीम का वर्षों पुराना सपना साकार हो ही गया। वह विश्व क्रिकेट में एक दिवसीय टीम का बादशाह बन गया। भले ही एक दिन के लिए ही क्यों न हो लेकिन क्रिकेट के इतिहास में नंबर-वन की रैकिंग में अपना नाम दर्ज करा ही लिया। ऐसा अवसर बार-बार नहीं आता। इस बादशाहत का स्वाद अब तक ऑस्ट्रेलिया व दक्षिण अफ्रीका ने ही चखा था लेकिन भारत लंबे समय से इसके इंतजार में था और जब वह अवसर आया तो न तो कहीं पटाखे फूटे और न ही धूम धड़ाका हुआ। चुपके से वह नंबर वन के सिंहासन पर बैठा और सिर्फ 24 घंटे में ही उतर गया। वैसे यह तो होना ही था। जिस तरह से भारतीय टीम ने श्रीलंका के खिलाफ दूसरा मैच खेला उससे तो किसी और तरह की उम्मीद बेमानी थी। टीम इंडिया को श्रीलंका ने खेल के हर क्षेत्र में मात दी और नंबर वन के ओहदे से बाहर कर दिया। खैर खेल में हार-जीत तो चलता ही रहता है लेकिन जिस तरह से टीम ने अपना स्थान बनाया है वह काबिल-ए-तारीफ है। उसने यह ओहदा यूं ही हासिल नहीं किया था। कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की काबिलियत और युवा तुर्क की मेहनत का नतीजा है कि टीम आज बड़े-बड़े तीसमार खां को पानी पिला रही है। वैसे इतने से ही काम नहीं चलने वाला है। टीम को अभी और कारनामे करने हैं। आईसीसी ट्रैकिंग शुरु होने के बाद यह पहला मौका है जब टीम इंडिया एक दिवसीय में दुनिया की नंबर एक टीम बनी है। हालांकि भारत ने कई बार नंबर-दो का स्थान हासिल किया था लेकिन उसका एकदिवसीय का बादशाह बनने का यह पहल मौका था। भारतीय टीम ने त्रिकोणीय श्रृंखला में जब अपने अभियान की शुरुआत की, तब वह शीर्ष पर कायम दक्षिण अफ्रीका से एक अंक पीछे था लेकिन न्यूजीलैंड के खिलाफ प्रभावशाली जीत ने उसे शीर्ष पर पहुंचा दिया और श्रीलंका के खिलाफ हार ने उसे तीसरे नंबर पर ढकेल दिया। खैर यह सब तो चलता ही रहता है। वर्षों तक ऑस्ट्रेलिया नंबर वन की कुर्सी पर काबिज था अब चौथे नंबर पर खिसक गया है। यह तो निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है इससे घबराने की जरूरत नहीं है। ऐसा है भी नहीं है कि अब मैच ही नहीं होगा। मैच तो सालभर होता है। इसीलिए यह कहते हैं कि टीम इंडिया के लिए ही नहीं सभी देशों के लिए विकल्प खुला है। लेकिन टीम इंडिया को चिंता करने की जरूरत नहीं है क्योंकि एक बार वह बादशाहत का स्वाद चख चुका है। विश्व चैंपियन भी बन चुका है। ट्वेंटी-20 का भी दुनिया में झंडा बुलंद कर चुका है। उसमें अब किसी चीज की चाहत नहीं बची है। ऐसे में दूसरे देशों को भी इसका स्वाद लेने का मौका देना चाहिए क्योंकि भारत देश ही ऐसा है, जो देने में विश्वास करता है, लेने में नहीं तभी तो 24 घंटे में ही बादशाहत दूसरे को सौंप दी। अच्छा है। ऐसे ही खेल दिखाते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब टीम इंडिया का हर मामले में डंका बजने लगेगा। खेल भावना तो हर क्षेत्र में होनी चाहिए। अच्छा खिलाड़ी वही होता है जो खेल भावना दिखाए। टीम इंडिया इसमें अग्रणी है। उसने भरपूर खेल भावना का मुजाहिरा किया है। उम्मीद है वह आगे भी इसी तरह का खेल दिखाता रहेगा। बहरहाल 24 घंटे की बादशाहद में खेल प्रेमियों को भावविभोर कर दिया और वे बल्ले-बल्ले करने लगे थे। इन 24 घंटे का उन्होने भरपूर लुत्फ भी उठाया। देखते ही देखते फायनल मैच आ धमका और भारत ने लंका में तिरंगा फहरा डाला फिर क्या कहने तीसरे से फिर दूसरे नंबर पर आ पहुंचा। लेकिन पहला नंबर अब कब आएगा यह कहना मुश्किल है। फिर भी यह कहने में कोई संकोच नहीं टीम इंडिया है ग्रेट।
ये वो दयार है जहाँ सच कहने की सज़ा मिलती है
विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर ने इकानॉमी क्लास को जानवरों का क्लास क्या कहा उन पर आफत आ गई है। विपक्ष तो विपक्ष उनकी अपनी पार्टी के लोगों की भी भौंहें तन गई हैं। वैसे शशि थरूर ने गलत क्या कहा था। सभी राजनेता, विधायक मंत्री इकानॉमी क्लास में सफर करने वालों को जानवर ही तो समझते हैं। उन पर हुक्म भी वैसे ही चलाते हैं। यह अलग बात है कि वे जुबान से कुछ कहते नहीं सिर्फ इशारों में ही सारी बातें कह लेते हैं। बेचारे शशि थरूर को क्या मालूम सच कहने की भी सजा मिलती है। लगता है अनजाने में ही उन्होंने वो सब कुछ उगल डाला, वह भी साफगोई से। दरअसल वे राजनेता तो थे नहीं। संयुक्त राष्टï्र में राजनयिक थे। कांग्रेस ने टिकट दिया, तो सांसद बन गए और फिर राज्यमंत्री का ओहदा हासिल कर लिया। लिहाजा राजनीति के दांव-पेंच नहीं सीख पाए। ऐसे में उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है। बेचारे कभी इस क्लास में सफर किया ही नहीं तो इसके बारे में जानेंगे भी क्या? अपने वरिष्ठïों से सुनी-सुनाई बातों को ही बातों-बातों में बोल गये। अब वहीं वरिष्ठ उनके पीछे हाथ-धोकर पड़ गए हैं। क्या-क्या नहीं कहा। बेचारा शशि सब कुछ चुपचाप सुन रहे हंै और सुनेंगे भी क्यों नहीं आखिर कहा तो है ही चाहे सच हो या झूठ। उन्होंने इसके लिए बकायदा माफी भी मांग ली है। लेकिन विपक्ष इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री से स्पष्टïीकरण मांग रहा है। आखिर प्रधानमंत्री इस पर क्या सफाई देंगे? सफाई जिनको देनी है उन्होंने तो दे दिया। अब इस मुद्दे को उछाले जाने से क्या फायदा। वैसे शशि थरूर ने एक गलती जरूर की है। उन्होंने अपनी पार्टी व सरकार की बातों पर अमल नहीं किया। जब सोनिया-राहुल जैसी हस्तियां इकानॉमी क्लास में सफर कर सकतीं हंै तो फिर वह क्यों नहीं। क्या इस पर सफर करने से व्यक्ति जानवर हो जाता है। भारत में वैसे भी गरीबों की कोई कमी नहीं है और प्रतिदिन हजारों लोग इस क्लास से सफर करते हैं। ऐसे में शशि थरूर ने अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मार ली है। भले ही वह इसके लिए दोषी न हो लेकिन जिम्मेदारी तो उन्हें लेनी पड़ेगी। वैसे यह विवादास्पद बयान उनका कोई पहला नहीं है। इससे पहले उन्होंने पांच सितारा होटल में रहने को लेकर भी आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। दरअसल यह सब इसलिए होता है क्योंकि इन्हें न तो गरीबी का अहसास है और न ही ऐसे लोग अपने-आपको जनप्रतिनिधि के रूप में ढाल पाते हैं। उन्हें भारत में अभी भी संयुक्त राष्ट्र जैसी सुविधाओं की चाहत है पर उन्हें कौन समझाए कि भारत गांव, गरीब और किसानों का देश है। जहां 77 फीसदी लोग रोज बीस रुपए में गुजर-बसर करते हैं जबकि पांच सितारा होटल में मंत्री का एक दिन का खर्च 20 हजार रुपए आता है। लेकिन थरूर को इसकी जानकारी है भी या नहीं यह पहले जानने-समझने की जरूरत है। हमारे मुताबिक तो उन्हें मालूम ही नहीं कि भारत है क्या? दरअसल पहले उन्हें भारत की वास्तविकता से रूबरू करना चाहिए था जो नहीं कराया गया और उन्हें एक झटके में ही मंत्री बना दिया। इसमें उनका क्या कसूर? बेचारे खामख्वाह बलि का बकरा बन गये। इनके जैसे या कहें कि इनके आगे ऐसे सैकड़ों तथा-कथित राजनेता हैं जो जनता को क्या-क्या नहीं समझते। वे परदे के पीछे रहकर सारा खेल-खेल लेते हैं। वैसे एक बात कटु सत्य है कि अब गरीब जनता के प्रतिनिधि गरीब नहीं रहे। इतना पैसा है उनके पास कि वे कहीं भी रह सकते हैं और कुछ भी कर सकते हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार लोकसभा में इस बार 135 तथा राज्यसभा में 105 करोड़पति सांसद हैं। ऐसे में थरूर ने इकानॉमी क्लास पर (नासमझ) टिप्पणी कर दी तो इतना बवाल अच्छा नहीं, क्योंकि संसद में भी ऐसे लोगों की अच्छी-खासी भीड़ है और लोकतंत्र में भीड़ की ही जय-जयकार होती है। राजनीति वो दयार है जहाँ सच कहने की सजा मिलती है।
