Thursday, July 30, 2009

न माया मिली न राम


न माया मिली न राम
आधा सच आधा गप

छत्तीसगढ़ में इन दिनों कानून व्यवस्था की स्थिति को लेकर सरकार पर चौतरफा हमला हो रहा है। फिर वह विधानसभा हो या फिर सभी जगह सरकार को आलोचनाओं से दो-चार होना पड़ रहा है। कांग्रेस तो हाथ-मुंह धोकर पीछे पड़ गई है। तीन दिन तक विधानसभा की कार्रवाई नहीं चलने दी। निश्चित रूप से मानपुर में नक्सली हिंसा के खिलाफ उसका उग्र रूप काबिल-ए-तारीफ है। लेकिन भाजपा की भी तारीफ करनी होगी खासकर मुख्यमंत्री रमन सिंह की जिनके कानों में जूं तक नहीं रेगी और एकदम अक्खड़ की तरह मैदान में डटे रहे। कांग्रेसी उठते-बैठते, सोते-जागते, हर समय मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग करते रहे। यहां तक कि नींद में भी मुख्यमंत्री के इस्तीफे के सपने उन्हें दिखने लगे थे लेकिन मुख्यमंत्री के एक बयान ने उनके खेलों पर पानी फेर दिया। मुख्यमंत्री ने न केवल इस्तीफा देने से इंकार कर दिया बल्कि यह कहकर कि 'मुझसे पहले ही दिन टेलीफोन करके पूछ लिया होता तो मैं उन्हें बता देता कि मैं इस्तीफा नहीं दे रहा हूं। चार दिन तक प्रदर्शन की जरूरत ही नहीं थी। यदि ऐसा करना ही है तो मैं पूरे पांच साल इस्तीफा नहीं देने वालाÓ उनकी बोलती बंद कर दी। कांग्रेसियों को भी समझ में आ गया कि अब उनकी दाल नहीं गलने वाली, लिहाजा सीधे पटरी पर लौट आए। आव देखा न ताव और ऐसा क्या सूझा कि मुख्यमंत्री से इस्तीफे की मांग करने लगे थे। जबकि उन्हें चाहिए था कि वे नक्सली हिंसा जैसे गंभीर विषय पर सदन में सरकार से जवाब मांगते और लचर होती कानून व्यवस्था को सुधारने दबाव डालते लेकिन ऐसा नहीं हो सका। और जब सदन में चर्चा हुई तब तक बहुत देर हो चुकी थी। एक गंभीर और मजबूत विपक्ष की भूमिका गौण हो गई। सरकार तो बहुमत में है ही। अपना सरकारी कामकाज आराम से निपटा लिया। न केवल नक्सलवाद पर चर्चा कराई, बल्कि अनुपूरक बजट को भी पारित करवा लिया। वह भी बगैर विपक्ष के। कांग्रेस को इस तरह का फैसला लेने से पहले गंभीरता से सोचना चाहिए था। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन जिस तरह से विधानसभा में अनुपूरक बजट जैसे कई महत्वपूर्ण सरकारी कामकाज बिना किसी चर्चा के पारित करवा लिया गया। इसके लिए सरकार नहीं बल्कि कांग्रेस खुद दोषी है। बात तो बड़ी-बड़ी कर रहे थे। मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग पर तीन दिनों तक अडिग रहे। राष्टï्रपति शासन तक की गुहार लगाई गई। लेकिन हासिल आया शून्य। जनता के दरबार में भी उनकी रेटिंग बढ़ी होगी ऐसा नहीं लगता। 'न माया मिली न रामÓ वाली कहावत पूरी तरह चरितार्थ हो गई है। वह एक सक्षम विपक्ष की भूमिका निभाने में भी असफल हो रही है। एक बात यह अच्छी दिखी कि अब उसमें एकता दिखने लगी है। बड़े नेता भी इसका राग अलाप रहे हैं। भले ही यह दिखावे के लिए ही क्यों न हो लेकिन इतने भर से ही भाजपाइयों के हाथ-पांव फूलने लगे थे। लेकिन 'नाच न आवै आंगन टेढ़ाÓ की कहावत चरितार्थ हो गई है। वे इस एकता (दिखाने के लिए ही सही) को संजोकर भी नहीं रख सके। और यदा-कदा उकी पोल खुलती दिख ही जाती है। फिर भी कईयों के चेहरों पर खुशी झलक रही थी। यह खुशी उबाल भी मारने लगी थी। वे कह रहे थे-काश। चुनाव के समय ऐसी एकता रहती। पर उन्हें कौन बताए कि ऐसी एकता चुनावों में भी थी पर दिखाई नहीं दी। तभी तो भाजपा की चारों ऊंगलियां अभी घी में है वरना सर कड़ाही में होता। इसीलिए तो हम कहते हैं कि गुटों में बंटी कांग्रेसियों को ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है। वह महज एक गुब्बारे की तरह है, कब फूट जाए पता ही नहीं चलता।

Monday, July 27, 2009

नौसेना एटमी ताकत से लैस

नौसेना एटमी ताकत से लैस
भारत पहली स्वदेशी परमाणु ऊर्जा से चलित पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत (दुश्मन का नाश) के जलावतरण के साथ रूस, चीन, फ्रांस व ब्रिटेन के बाद यह क्षमता हासिल करने वाला छठा देश बन गया है। अब यह थल और आकाश के बाद गहरे समुद्र के भीतर से परमाणु हमले का करारा जवाब दे सकता है। नि:संदेह भारत के लिए यह बेहद अहम उपलब्धि है तथा नौ सेना के क्षेत्र में उसने एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर पार कर लिया है। इस परमाणु पनडुब्बी का परीक्षण अभी डेढ़ साल तक चलेगा और उम्मीद है कि यह 2011 तक पूरी तरह काम करने लायक हो पाएगी। भारत की सुरक्षा के लिहाज से समुद्री सीमाएँ बेहद अहम होती जा रही हैं और सैन्य तैयारी को बदलते परिवेश में ढालना बेहद जरूरी है। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भी कहा है कि सरकार राष्ट्रीय हितों और भौगोलिक अखंडता की रक्षा के लिए वचनबद्ध है। उन्होंने कहा कि हमारा तेवर आक्रामक नहीं है और न हम किसी को डराना चाहते हैं। हम अपनी सेेनाओं के आधुनिकीकरण के लिए लगातार काम करते रहेंगे, जिससे वे नवीनतम प्रौद्योगिकी से लैस रहें। उल्लेखनीय है कि पूर्णत: स्वदेश में निर्मित पनडुब्बी अरिहंत को परमाणु ईंधन से चलने के कारण बार-बार ईंधन व आक्सीजन लेने के लिए समुद्र के भीतर से बाहर आने की जरूरत नहीं है। समुद्र के भीतर 500 मीटर नीचे तक लंबे समय तक रहने में वह सक्षम है। साथ ही समुद्र में सतह के नीचे प्रति घंटा 22 से 28 समुद्री मील तक दौडऩे में सक्षम है। फिलहाल इसमें 700 कि.मी. तक मार करने वाली एक दर्जन के -15 मिसाइलें होंगी। आने वाले समय में 3500 कि.मी. तक मार करने में सक्षम के-एक्स मिसाइल तैनाती की योजना है। इसमें क्रूज मिसाइल भी तैनात की जा सकेंगी। पनडुब्बी में परमाणु ईंधन के जरिए 85 मेगावाट बिजली उत्पादन के संयंत्र भी मौजूद हैं। नौसेना की योजना अगले 20 सालों में ऐसी 10 पनडुब्बियों के निर्माण की है। यहां यह बताना लाजिमी है कि अरिहंत का स्वप्न पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने 39 साल पहले देखा था। उन्होंने 1970 में नौ सेना व भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र को इस पर काम करने कहा था। तकनीकी रूप से परमाणु ईंधन चलित प्रणालियाँ तैयार करने की योजना 60 के दशक में बन गई थी। हालांकि इंदिरा गांधी के सपने को साकार करने का काम 1984 में एडवांस वैसल कार्यक्रम के तहत शुरू हो पाया। बहरहाल हमारे वैज्ञानिकों की इस महत्वपूर्ण उपलब्धि पर पूरे देशवासियों को गर्व है। उन्हें इस नई एटमी ताकत पर ढेरों बधाइयां व शुभकामनाएं।

राखी का स्वयंवर और राजनीति


राखी का स्वयंवर और राजनीति
देश में इन दिनों प्यार, तकरार, संवाद, एक्शन, रोमांच सभी कुछ देखने-सुनने को मिल रहा है। यानी कि जनता के मनोरंजक के लिए भरपूर मसाला है। एक ओर राखी का स्वयंवर है तो दूसरी ओर समलैंगिकता का सवाल। वहीं राजनीतिज्ञों का राजनीतिक बवाल भी कम मनोरंजन नहीं है। मतलब सब कुछ यहीं है। राखी के स्वयंवर के बहाने जो शो दिखाया जा रहा है वह बेहद लोकप्रिय हो गया है। इस शो में न केवल राखी से ब्याह रचाने वाले युवक हैं बल्कि उनकी मां भी पूरे चमक-दमक से राखी सॉरी अपनी बहू से बतियाते नजर आती है। अब यह देखना दिलचस्प है कि राखी किनकी बहू बनेगी। अब तक तो 16 कुंवारे में से सिर्फ 5 ही बचे हैं। यानी फिलहाल इन पांच पांडव में राखी द्रौपदी की भूमिका में है। राखी ने बकायदा इन पांचों के लिए करवाचौथ का व्रत भी रखा। पांचों युवकों ने भी अपनी पतिव्रता पत्नी के सामने पत्नीव्रता होने का सबूत देने के लिए व्रत रखा। लेकिन इसमें इन युवकों की माताओं का शामिल होना इसे और रोचक बना गया। पांच में से 4 की माताओं ने अपनी भावी बहू और बेटों का व्रत खुलवाया। यह सब देखने-सुनने में अटपटा जरूर लगता है पर है सौ फीसदी सच। फिलहाल राखी पांच पांडव रूपी कुवारों की पत्नी द्रौपदी के रूप में जिस तरह बुद्धूबक्सा पर अवतरित होती है वह किसी परी की कथा की तरह रोमांचकारी से कम नहीं है। लोग चटखारे ले लेकर इसे देखते ही नहीं बल्कि मजा भी लेेते हैं और लेेंगे भी क्यों नहीं आखिर राखी है ही कमाल की। अपने पुराने दोस्त अभिषेक को थप्पड़ जडऩे के बाद सुर्खियां बटोरने वाली राखी हमेशा मीडिया की चहेती रही है और आज भी वह मीडिया में छायी हुई है। यह नुस्खा राखी के अलावा और किसी को आता तो वह राजनेताओं के अलावा दूसरा कोई हो नहीं सकता। आजकल राजनेताओं को भी मीडिया में छाने का चस्का लगा हुआ है। फिर चाहे वह तरीका गलत ही क्यों न हो। उत्तरप्रदेश में रीता बहुगुणा जोशी ने मायावती को ऐसा क्या कह डाला कि रातों-रात वह स्टार से सुपरस्टार हो गई। राष्टï्रीय क्या अंतर्राष्टï्रीय मीडिया की सुर्खियां बन गई। जो बात रीता ने अभी कही है। कमोबेश कुछ इसी अंदाज में पूर्व में मायावती ने मुलायम सिंह के राज में कही थी तब इतना बखेड़ा खड़ा नहीं हुआ था। अभी तो सोनिया जी तक को सामने आना पड़ा। उन्हें खेद जतानी पड़ी। बावजूद बसपाइयों ने बहनजी के इशारों पर वह सब कुछ कर डाला जो नहीं करना चाहिए। रीता बहुगुणा के घर तक को जला डाला। राजनीति में शुचिता का राग अलापने वालों के राज में बहनजी के भाइयों ने जो कहर बरपाया है वह कदापि उचित नहीं है लेकिन कहते हैं राजनीति में सब जायज है। कभी बहनजी ने भी यह सब भोगा है तो उसका बदला तो लेना ही था। और जब सत्ता हाथ में हो तो बदला लेने का इससे अच्छा अवसर और कब मिलेगा? सो वे चुन-चुनकर बदला ले रही हंै। वैसे यह तो होना ही था। जैसे को तैसा वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। मुलायम राज की सतायी बहनजी अपने राज में पूरा सूद सहित वसूल रही हंै लेकिन उनको धैर्य भी रखना चाहिए आखिर ऊपर वाला सब कुछ देख-समझ रहा है। यदि उसका ब्रम्हास्त्र चल गया तो न तो बहन जी रहेंगी और न ही उनकी सत्ता। फिर हमें क्या हम तो सिर्फ बोल सकते हैं। खैर बात यही खत्म करें लेकिन क्यों? राजनीति के धुरंधर हर चीज में राजनीति ढूंढते हैं। अब देख लें हाईकोर्ट ने समलैंगिकता को कानूनी मान्यता क्या दी बवाल खड़ा हो गया। नेता-अभिनेता को तो छोड़ दें मुल्ला-मौलवी से लेकर बाबाओं तक की भुजाएं फड़कने लगी है लेकिन मामला कोर्ट में है, लिहाजा न तो बाबाओं की चलेगी और न ही नेताओं की। सब कुछ अब उन पर निर्भर है यानी कोर्ट पर। फिर भी इनकी चिल्लपों थम नहीं रही है। अच्छा भी है इसी बहाने चर्चा में जो हैं और राजनीति के लिए यह जरूरी भी है।

Sunday, July 26, 2009

'चांउर वाले बाबा की जय हो


'चांउर वाले बाबा की जय हो
वैश्विक मंदी और महंगाई की मार से बेशक देशभर में तूफान मचा हो लेकिन छत्तीसगढ़ में गरीबों की पौ-बारह है। उनके तो दोनों हाथों में लड्डू हैं। कहा जा रहा है कि राज्य में 70 फीसदी लोग गरीब हैं लेकिन गरीबी अब छू-मंतर हो गई है। कहीं कोई गरीब दिखाई ही नहीं दे रहा है। जहां देखो वहां मस्त मौला लोगों का हुजूम ही दिखाई दे रहा है। गांव, कस्बा, शहर हर जगह इनकी धमा चौकड़ी जारी है। मानसून भले ही दगा दे गया हो लेकिन इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। इनके तो जलवे ही जलवे हैं, और यह सब हो रहा है 'बाबा की कृपा से। न तो उन्हें काम-धंधा की जरूरत है और न ही किसी की जी-हुजूरी की। 'अल्लाह दे खाने को तो कौन जाए कमाने को की तर्ज पर ये अपनी जिम्मेदारी 'बाबा के सहारे छोड़ सुध-बुध खोकर निश्चिंत हो गए हैं। यह सब देखने से लगता है कि वाकई अब छत्तीसगढ़ में गरीबी धीरे-धीरे खत्म हो रही है पर कैसे? यह हर कोई जानना चाहता है। दरअसल 'बाबा यानी 'चांऊर वाले बाबा की छत्रछाया में गरीब फुदक रहे हैं। उन्हें भलीभांति मालूम कि जब तक 'बाबा की कृपा दृष्टिï उन पर रहेगी तब तक उन लोगों पर किसी की कुदृष्टिï का असर नहीं होने वाला। 'चांऊर वाले बाबा भी पूरी तरह मेहरबान हैं। पहले 2 रु. किलो में चावल देते थे अब एक रुपया कर दिया है। उपर से नमक फ्री। यानी 'सोने पे सुहागा। उनकी पांचों ऊंगलियां घी में हैं। काम-धाम की जरूरत ही नहीं है। आधे दिन की कमाई में ही बोरी भर चावल जो मिल जा रहा है। घर-परिवार की चिंता से भी मुक्ति मिल गई हैं। और जब सब कुछ हरा-हरा हो तो कुछ और ही सूझता है। लिहाजा 'मधुशाला की सैर करने लगे हैं। वे खुलकर कह रहे हैं हे 'चांऊर वाले बाबा तेरा लाख-लाख शुक्रिया। यूं ही हम पर कृपा बनाए रखना। 'न काहू से दोस्ती न काहू से बैर हर शाम हमारा गुलजार रहे बस। यही कामना है। वैसे तो अब तक उनकी शाम गुलजार हो ही रही है और यह तय है जब तक 'चांऊर वाले बाबा की छत्रछाया रहेगी तब तक न केवल शाम बल्कि हर सुबह-शाम गुलजार ही गुलजार रहेगी। उम्मीद है आगामी 5 सल तक यही स्थिति बनी रहेगी। यही कारण है कि 'चांऊर वाले बाबा के भक्तों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। यह देखकर विपक्ष के पेट में दर्द होने लगा है। यह स्वभाविक भी है। केंद्र की सरकार ने भी 3 रुपए प्रति किलो की दर से चावल देने की घोषणा की है बावजूद 'बाबा की ओर लोग खिंचे चले जा रहे हैं। ऐसा लगता है कि केंद्र के चांवल से उनके पेट का हाजमा खराब हो जाता है। बहरहाल 'बाबा का जादू इस कदर चला है कि लोग बड़े-बड़ों को भूल गए हैं। चहूं ओर 'बाबा की जय-जयकार हो रही है। और यह तो होना ही था। सावन का महीना और बाबा की जय-जयकार न हो यह कैसे हो सकता है। फिर चाहे वह 'भोले बाबा हो या फिर 'चांऊर वाले बाबा हैं तो आखिर 'बाबा ही। हम भी कह रहे हैं जय हो 'बाबा की।राखी का स्वयंवर और राजनीतिदेश में इन दिनों प्यार, तकरार, संवाद, एक्शन, रोमांच सभी कुछ देखने-सुनने को मिल रहा है। यानी कि जनता के मनोरंजक के लिए भरपूर मसाला है। एक ओर राखी का स्वयंवर है तो दूसरी ओर समलैंगिकता का सवाल। वहीं राजनीतिज्ञों का राजनीतिक बवाल भी कम मनोरंजन नहीं है। मतलब सब कुछ यहीं है। राखी के स्वयंवर के बहाने जो शो दिखाया जा रहा है वह बेहद लोकप्रिय हो गया है। इस शो में न केवल राखी से ब्याह रचाने वाले युवक हैं बल्कि उनकी मां भी पूरे चमक-दमक से राखी सॉरी अपनी बहू से बतियाते नजर आती है। अब यह देखना दिलचस्प है कि राखी किनकी बहू बनेगी। अब तक तो 16 कुंवारे में से सिर्फ 5 ही बचे हैं। यानी फिलहाल इन पांच पांडव में राखी द्रौपदी की भूमिका में है। राखी ने बकायदा इन पांचों के लिए करवाचौथ का व्रत भी रखा। पांचों युवकों ने भी अपनी पतिव्रता पत्नी के सामने पत्नीव्रता होने का सबूत देने के लिए व्रत रखा। लेकिन इसमें इन युवकों की माताओं का शामिल होना इसे और रोचक बना गया। पांच में से 4 की माताओं ने अपनी भावी बहू और बेटों का व्रत खुलवाया। यह सब देखने-सुनने में अटपटा जरूर लगता है पर है सौ फीसदी सच। फिलहाल राखी पांच पांडव रूपी कुवारों की पत्नी द्रौपदी के रूप में जिस तरह बुद्धूबक्सा पर अवतरित होती है वह किसी परी की कथा की तरह रोमांचकारी से कम नहीं है। लोग चटखारे ले लेकर इसे देखते ही नहीं बल्कि मजा भी लेेते हैं और लेेंगे भी क्यों नहीं आखिर राखी है ही कमाल की। अपने पुराने दोस्त अभिषेक को थप्पड़ जडऩे के बाद सुर्खियां बटोरने वाली राखी हमेशा मीडिया की चहेती रही है और आज भी वह मीडिया में छायी हुई है। यह नुस्खा राखी के अलावा और किसी को आता तो वह राजनेताओं के अलावा दूसरा कोई हो नहीं सकता। आजकल राजनेताओं को भी मीडिया में छाने का चस्का लगा हुआ है। फिर चाहे वह तरीका गलत ही क्यों न हो। उत्तरप्रदेश में रीता बहुगुणा जोशी ने मायावती को ऐसा क्या कह डाला कि रातों-रात वह स्टार से सुपरस्टार हो गई। राष्टï्रीय क्या अंतर्राष्टï्रीय मीडिया की सुर्खियां बन गई। जो बात रीता ने अभी कही है। कमोबेश कुछ इसी अंदाज में पूर्व में मायावती ने मुलायम सिंह के राज में कही थी तब इतना बखेड़ा खड़ा नहीं हुआ था। अभी तो सोनिया जी तक को सामने आना पड़ा। उन्हें खेद जतानी पड़ी। बावजूद बसपाइयों ने बहनजी के इशारों पर वह सब कुछ कर डाला जो नहीं करना चाहिए। रीता बहुगुणा के घर तक को जला डाला। राजनीति में शुचिता का राग अलापने वालों के राज में बहनजी के भाइयों ने जो कहर बरपाया है वह कदापि उचित नहीं है लेकिन कहते हैं राजनीति में सब जायज है। कभी बहनजी ने भी यह सब भोगा है तो उसका बदला तो लेना ही था। और जब सत्ता हाथ में हो तो बदला लेने का इससे अच्छा अवसर और कब मिलेगा? सो वे चुन-चुनकर बदला ले रही हंै। वैसे यह तो होना ही था। जैसे को तैसा वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। मुलायम राज की सतायी बहनजी अपने राज में पूरा सूद सहित वसूल रही हंै लेकिन उनको धैर्य भी रखना चाहिए आखिर ऊपर वाला सब कुछ देख-समझ रहा है। यदि उसका ब्रम्हास्त्र चल गया तो न तो बहन जी रहेंगी और न ही उनकी सत्ता। फिर हमें क्या हम तो सिर्फ बोल सकते हैं। खैर बात यही खत्म करें लेकिन क्यों? राजनीति के धुरंधर हर चीज में राजनीति ढूंढते हैं। अब देख लें हाईकोर्ट ने समलैंगिकता को कानूनी मान्यता क्या दी बवाल खड़ा हो गया। नेता-अभिनेता को तो छोड़ दें मुल्ला-मौलवी से लेकर बाबाओं तक की भुजाएं फड़कने लगी है लेकिन मामला कोर्ट में है, लिहाजा न तो बाबाओं की चलेगी और न ही नेताओं की। सब कुछ अब उन पर निर्भर है यानी कोर्ट पर। फिर भी इनकी चिल्लपों थम नहीं रही है। अच्छा भी है इसी बहाने चर्चा में जो हैं और राजनीति के लिए यह जरूरी भी है।