Tuesday, October 6, 2009

आधा सच आधा गप
चांउर वाले से गांधी बाबा तक

छत्तीसगढ़ में 'राम-राजÓ का सपना दिखाकर दूसरी बार सत्ता हथियाने वाली भारतीय जनता पार्टी भले ही इस सपना को साकार नहीं कर पा रही हो लेकिन इसकी जगह पर विराजमान 'रमन-राजÓ जरूर आम जनता के सपने को साकार करने में कोई कसर बाकी नहीं रखना चाह रहा है। यही वजह है कि हर-एक खास मौके पर कुछ न कुछ फुलझड़ी छोड़कर आम जनता को खुश करने की कोशिश में लगा रहता है। पहले से ही 'चांऊर वाले बाबाÓ के रूप में ख्याति अर्जित कर चुके मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अब किसानों के उद्धार का बीड़ा उठाया है। गरीबों की गरीबी भले ही दूर न हो सकी हो लेकिन इसी बहाने अमीरों की अमीरी में अच्छी खासी वृद्धि जरूर हो गई है। पूरे प्रदेश में गरीबों की संख्या में इस कदर वृद्धि हुई है कि कार, मोटर सायकल और यहां तक कि हवाई जहाज में सफर करने वाले 'गरीबोंÓ की पौ-बारह है। और यह तो होना ही है। आखिर दुनिया में उसी की पूछ-परख होती है, जिनके पास 'मनी रामÓ होता है। फिर गरीब उससे अछूता कैसे रह सकता है? लिहाजा उन गरीबों की पूछ-परख बढ़ी है जिनके पास 'मनी रामÓ है यानी सर्वगुण संपन्न 'गरीबोंÓ को ही गरीबी रेखा से नीचे वाले 'लाल-पीले-नीलेÓ राशन कार्ड जारी हुए हैं और वे उनका भरपूर दोहन भी किए हैं। स्थिति यह है कि एक रुपया व दो रुपया किलो में चावल केवल 35 किलो ही नहीं बल्कि ये 'गरीबÓ तो बोरी भर-भर कर ट्रकों से ले जाते देखे गए हैं। इसे ही तो कहते हैं 'रमन-राजÓ और ऐसे में सब कुछ संभव है। गरीबों के बाद अब किसानों की बारी है। उनके उद्धार के लिए सरकार ने क्या-क्या जतन नहीं किए। उनके लिए हर तरह की सहायता देने का ऐलान किया है। तीन फीसदी ब्याज दर पर ऋण देने की घोषणा कर पूरे प्रदेश की पहली सरकार तो पहले ही बन गई थी जो ऐसा कर रही है। इतने से ही किसानों के दिन नहीं फिरने वाले, लिहाजा सरकार ने सरप्लस बिजली को मुफ्त में बांटने का समझदारी पूर्ण कार्य किया है। उसने पांच हार्स पावर के सिंचाई पंपों के लिए मुफ्त बिजली देने की घोषणा की थी 'गांधी जयंतीÓ पर इसे लागू कर सरकार ने बता दिया कि वे न केवल किसानो की हितैषी है बल्कि गांधी जी के 'ग्राम स्वराजÓ की कल्पना को भी साकार करना चाहते हैं। तभी तो गांधी जयंती पर मुख्यमंत्री ने किसानों को ब्याज मुफ्त ऋण देने की मंशा जाहिर करने के अलावा पंचवर्षीय योजनाओं की राशि का अधिक से अधिक बहाव देश के गांवों की ओर करने की बात कहकर आम जनता का दिल जीतने की कोशिश की है। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा है कि देश और प्रदेश के अंतिम गांव तक सड़क, सिंचाई, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच हो, स्थानीय संसाधनों पर आधारित कुटीर उद्योगों का विकास हो, तभी हम राष्टï्रपिता के 'स्वावलंबी गांवÓ और 'ग्राम स्वराजÓ के सपने को साकार कर सकेंगे। मुख्यमंत्री की यह सोच तो काबिल-ए-तारीफ है। लेकिन अचानक मुख्यमंत्री का 'गांधी प्रेमÓ समझ से परे है। अब तक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पं. दीनदयाल उपाध्याय के पद चिन्हों पर चलने का दावा करने वाले डॉ. रमन सिंह का 'गांधी-प्रेमÓ देख प्रदेश की जनता न केवल अचंभित है बल्कि गदगद भी है। भले ही इससे संघी व कट्टर भाजपाई नाक-भौ सिकुड़े लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पडऩे वाला क्योंकि समय बड़ा बलवान होता है। आज जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत हर जगह चरितार्थ हो रही है ऐसे में मुख्यमंत्री से पंगा भला कौन लेना चाहेगा। फिर मुख्यमंत्री जी इतने बुद्धू भी नहीं हैं जो ऐसी बात यूं ही करेंगे। इसमें भी कई राज छिपे हुए हैं। समय-समय की बात है। नगरीय निकाय के चुनाव समीप है। ऐसे में गांव-गरीब व किसान की बात नहीं होगी तो फिर किसकी होगी? खैर। हमें क्या हम तो महज देखने-सुनने वाले हैं यदि भाजपा के राज में 'गांधी-बाबाÓ के दिन लौटेंगे तो बुराई ही क्या है?

Saturday, September 26, 2009

आधा सच आधा गप

24 घंटे की बादशाहत
आखिरकार भारतीय क्रिकेट टीम का वर्षों पुराना सपना साकार हो ही गया। वह विश्व क्रिकेट में एक दिवसीय टीम का बादशाह बन गया। भले ही एक दिन के लिए ही क्यों न हो लेकिन क्रिकेट के इतिहास में नंबर-वन की रैकिंग में अपना नाम दर्ज करा ही लिया। ऐसा अवसर बार-बार नहीं आता। इस बादशाहत का स्वाद अब तक ऑस्ट्रेलिया व दक्षिण अफ्रीका ने ही चखा था लेकिन भारत लंबे समय से इसके इंतजार में था और जब वह अवसर आया तो न तो कहीं पटाखे फूटे और न ही धूम धड़ाका हुआ। चुपके से वह नंबर वन के सिंहासन पर बैठा और सिर्फ 24 घंटे में ही उतर गया। वैसे यह तो होना ही था। जिस तरह से भारतीय टीम ने श्रीलंका के खिलाफ दूसरा मैच खेला उससे तो किसी और तरह की उम्मीद बेमानी थी। टीम इंडिया को श्रीलंका ने खेल के हर क्षेत्र में मात दी और नंबर वन के ओहदे से बाहर कर दिया। खैर खेल में हार-जीत तो चलता ही रहता है लेकिन जिस तरह से टीम ने अपना स्थान बनाया है वह काबिल-ए-तारीफ है। उसने यह ओहदा यूं ही हासिल नहीं किया था। कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की काबिलियत और युवा तुर्क की मेहनत का नतीजा है कि टीम आज बड़े-बड़े तीसमार खां को पानी पिला रही है। वैसे इतने से ही काम नहीं चलने वाला है। टीम को अभी और कारनामे करने हैं। आईसीसी ट्रैकिंग शुरु होने के बाद यह पहला मौका है जब टीम इंडिया एक दिवसीय में दुनिया की नंबर एक टीम बनी है। हालांकि भारत ने कई बार नंबर-दो का स्थान हासिल किया था लेकिन उसका एकदिवसीय का बादशाह बनने का यह पहल मौका था। भारतीय टीम ने त्रिकोणीय श्रृंखला में जब अपने अभियान की शुरुआत की, तब वह शीर्ष पर कायम दक्षिण अफ्रीका से एक अंक पीछे था लेकिन न्यूजीलैंड के खिलाफ प्रभावशाली जीत ने उसे शीर्ष पर पहुंचा दिया और श्रीलंका के खिलाफ हार ने उसे तीसरे नंबर पर ढकेल दिया। खैर यह सब तो चलता ही रहता है। वर्षों तक ऑस्ट्रेलिया नंबर वन की कुर्सी पर काबिज था अब चौथे नंबर पर खिसक गया है। यह तो निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है इससे घबराने की जरूरत नहीं है। ऐसा है भी नहीं है कि अब मैच ही नहीं होगा। मैच तो सालभर होता है। इसीलिए यह कहते हैं कि टीम इंडिया के लिए ही नहीं सभी देशों के लिए विकल्प खुला है। लेकिन टीम इंडिया को चिंता करने की जरूरत नहीं है क्योंकि एक बार वह बादशाहत का स्वाद चख चुका है। विश्व चैंपियन भी बन चुका है। ट्वेंटी-20 का भी दुनिया में झंडा बुलंद कर चुका है। उसमें अब किसी चीज की चाहत नहीं बची है। ऐसे में दूसरे देशों को भी इसका स्वाद लेने का मौका देना चाहिए क्योंकि भारत देश ही ऐसा है, जो देने में विश्वास करता है, लेने में नहीं तभी तो 24 घंटे में ही बादशाहत दूसरे को सौंप दी। अच्छा है। ऐसे ही खेल दिखाते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब टीम इंडिया का हर मामले में डंका बजने लगेगा। खेल भावना तो हर क्षेत्र में होनी चाहिए। अच्छा खिलाड़ी वही होता है जो खेल भावना दिखाए। टीम इंडिया इसमें अग्रणी है। उसने भरपूर खेल भावना का मुजाहिरा किया है। उम्मीद है वह आगे भी इसी तरह का खेल दिखाता रहेगा। बहरहाल 24 घंटे की बादशाहद में खेल प्रेमियों को भावविभोर कर दिया और वे बल्ले-बल्ले करने लगे थे। इन 24 घंटे का उन्होने भरपूर लुत्फ भी उठाया। देखते ही देखते फायनल मैच आ धमका और भारत ने लंका में तिरंगा फहरा डाला फिर क्या कहने तीसरे से फिर दूसरे नंबर पर आ पहुंचा। लेकिन पहला नंबर अब कब आएगा यह कहना मुश्किल है। फिर भी यह कहने में कोई संकोच नहीं टीम इंडिया है ग्रेट।

ये वो दयार है जहाँ सच कहने की सज़ा मिलती है
विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर ने इकानॉमी क्लास को जानवरों का क्लास क्या कहा उन पर आफत आ गई है। विपक्ष तो विपक्ष उनकी अपनी पार्टी के लोगों की भी भौंहें तन गई हैं। वैसे शशि थरूर ने गलत क्या कहा था। सभी राजनेता, विधायक मंत्री इकानॉमी क्लास में सफर करने वालों को जानवर ही तो समझते हैं। उन पर हुक्म भी वैसे ही चलाते हैं। यह अलग बात है कि वे जुबान से कुछ कहते नहीं सिर्फ इशारों में ही सारी बातें कह लेते हैं। बेचारे शशि थरूर को क्या मालूम सच कहने की भी सजा मिलती है। लगता है अनजाने में ही उन्होंने वो सब कुछ उगल डाला, वह भी साफगोई से। दरअसल वे राजनेता तो थे नहीं। संयुक्त राष्टï्र में राजनयिक थे। कांग्रेस ने टिकट दिया, तो सांसद बन गए और फिर राज्यमंत्री का ओहदा हासिल कर लिया। लिहाजा राजनीति के दांव-पेंच नहीं सीख पाए। ऐसे में उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है। बेचारे कभी इस क्लास में सफर किया ही नहीं तो इसके बारे में जानेंगे भी क्या? अपने वरिष्ठïों से सुनी-सुनाई बातों को ही बातों-बातों में बोल गये। अब वहीं वरिष्ठ उनके पीछे हाथ-धोकर पड़ गए हैं। क्या-क्या नहीं कहा। बेचारा शशि सब कुछ चुपचाप सुन रहे हंै और सुनेंगे भी क्यों नहीं आखिर कहा तो है ही चाहे सच हो या झूठ। उन्होंने इसके लिए बकायदा माफी भी मांग ली है। लेकिन विपक्ष इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री से स्पष्टïीकरण मांग रहा है। आखिर प्रधानमंत्री इस पर क्या सफाई देंगे? सफाई जिनको देनी है उन्होंने तो दे दिया। अब इस मुद्दे को उछाले जाने से क्या फायदा। वैसे शशि थरूर ने एक गलती जरूर की है। उन्होंने अपनी पार्टी व सरकार की बातों पर अमल नहीं किया। जब सोनिया-राहुल जैसी हस्तियां इकानॉमी क्लास में सफर कर सकतीं हंै तो फिर वह क्यों नहीं। क्या इस पर सफर करने से व्यक्ति जानवर हो जाता है। भारत में वैसे भी गरीबों की कोई कमी नहीं है और प्रतिदिन हजारों लोग इस क्लास से सफर करते हैं। ऐसे में शशि थरूर ने अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मार ली है। भले ही वह इसके लिए दोषी न हो लेकिन जिम्मेदारी तो उन्हें लेनी पड़ेगी। वैसे यह विवादास्पद बयान उनका कोई पहला नहीं है। इससे पहले उन्होंने पांच सितारा होटल में रहने को लेकर भी आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। दरअसल यह सब इसलिए होता है क्योंकि इन्हें न तो गरीबी का अहसास है और न ही ऐसे लोग अपने-आपको जनप्रतिनिधि के रूप में ढाल पाते हैं। उन्हें भारत में अभी भी संयुक्त राष्ट्र जैसी सुविधाओं की चाहत है पर उन्हें कौन समझाए कि भारत गांव, गरीब और किसानों का देश है। जहां 77 फीसदी लोग रोज बीस रुपए में गुजर-बसर करते हैं जबकि पांच सितारा होटल में मंत्री का एक दिन का खर्च 20 हजार रुपए आता है। लेकिन थरूर को इसकी जानकारी है भी या नहीं यह पहले जानने-समझने की जरूरत है। हमारे मुताबिक तो उन्हें मालूम ही नहीं कि भारत है क्या? दरअसल पहले उन्हें भारत की वास्तविकता से रूबरू करना चाहिए था जो नहीं कराया गया और उन्हें एक झटके में ही मंत्री बना दिया। इसमें उनका क्या कसूर? बेचारे खामख्वाह बलि का बकरा बन गये। इनके जैसे या कहें कि इनके आगे ऐसे सैकड़ों तथा-कथित राजनेता हैं जो जनता को क्या-क्या नहीं समझते। वे परदे के पीछे रहकर सारा खेल-खेल लेते हैं। वैसे एक बात कटु सत्य है कि अब गरीब जनता के प्रतिनिधि गरीब नहीं रहे। इतना पैसा है उनके पास कि वे कहीं भी रह सकते हैं और कुछ भी कर सकते हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार लोकसभा में इस बार 135 तथा राज्यसभा में 105 करोड़पति सांसद हैं। ऐसे में थरूर ने इकानॉमी क्लास पर (नासमझ) टिप्पणी कर दी तो इतना बवाल अच्छा नहीं, क्योंकि संसद में भी ऐसे लोगों की अच्छी-खासी भीड़ है और लोकतंत्र में भीड़ की ही जय-जयकार होती है। राजनीति वो दयार है जहाँ सच कहने की सजा मिलती है।

Saturday, August 29, 2009

आधा सच आधा गप

अच्छा सिला दिया तूने...!
बेचारे जसवंत। 'न घर के रहे न घाट केÓ। जिन्ना का जिन इस कदर हावी हो गया है कि वह पीछा छोडऩे का नाम ही नहीं ले रहा है। क्या पता था कि जिन्ना की एक तारीफ उन्हें विरह की तपिश झेलने को मजबूर कर देगी। दूसरी पार्टियां (भाजपा को छोड़कर) तो पीछे पड़ी ही थीं अब अपनी पार्टी ने भी दामन झटक लिया। उन्हें सपने में भी यह उम्मीद नहीं थी कि जिनका 30 वर्षों का साथ था वह एक झटके में ही उनसे किनारा कर लेंगे। उन्हें लगा था कि जब आडवाणी जिन्ना की मजार पर जाकर नतमस्तक हो सकते हैं। उनकी तारीफों में कसीदे गढ़ सकते हैं तो मैं क्यों नहीं? लेकिन उन्हें पता होना चाहिए था कि आडवाणी और जसवंत में जमीन-आसमान का अंतर है। आडवाणी लौह पुरुष जो ठहरे और जसवंत...। खैर जो भी हो लेकिन जसवंत ने भाजपा के लिए क्या-क्या नहीं किया। बदले में उन्हें यह सिला दिया..। कभी उन्हें पार्टी का हनुमान कहा जाता था, एक झटके में रावण बना दिया। वैसे यह कोई नई बात नहीं है। सभी पार्टियों में इस तरह की उठा-पटक होती है। अपना वर्चस्व बनाए रखने दूसरे के पर कतरना जरूरी होता है, लेकिन यहां तो पर नहीं पार्टी से ही परे कर दिया गया। जब से अटलबिहारी वाजपेयी ने सक्रिय राजनीति से संन्यास लिया है तब से उनके चहेतों को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है। जसवंत भी इसके शिकार हो गए। जब दूसरों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है तो फिर जसवंत कैसे बचते? उनके साथ तो ऐसा होना ही था। इंजार था तो सिर्फ सही मौकों का और यह मौका 'जिन्नाÓ ने दे दिया। फिर क्या 'बिल्ली के भाग्य से छींका टूटाÓ वाली कहावत चरितार्थ हो गई। न नोटिस, न निलंबन सीधी कार्रवाई। इसे कहते हैं अनुशासन का डंडा। इसी बहाने औरों को भी संदेश दे दिया गया। कभी आडवाणी पर भी 'जिन्नाÓ का भूत सवार था लेकिन उनसे अध्यक्षीय पद छीनकर लगाम लगाने की कोशिश की गई थी। जसवंत सिंह के साथ जो हुआ उससे सभी अचंभित हैं। ऊपर से 5 साल की मेहनत के बाद जो किताब जिन्ना पर लिखी थी उस पर भी प्रतिबंध ठोंक दिया। यह तो दुबले पर दो आषाढ़ वाली स्थिति हो गई। पार्टी से अलग कर दें यह ठीक है, लेकिन किताब पर प्रतिबंध लगाकर उसने लाखों करोड़ों लोगों को उसे पढऩे से वंचित कर दिया। यह तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार है। भाजपा सदैव स्वतंत्रता की बात करती है फिर यह क्या? लगता है भाजपा जसवंत पर पूरे तीस साल का खुन्नस एक ही बार में उतार लेना चाहती है। लेकिन जसवंत को मायूस होने या डरने की जरूरत नहीं है। अब देश में ही नहीं विदेशों में भी उनके जख्मों पर मरहम लगाने वालों की कमी नहीं है। भाजपा ने भले ही उन्हें 'दूध से मक्खी की तरहÓ निकाल बाहर कर दिया हो लेकिन कई ऐसे दल या संगठन हैं, जो उनके विचारों से इत्तफाक रखते हैं। पाकिस्तान में तो जसवंत सिंह की जय-जयकार हो रही है और होना भी चाहिए। आखिर जसवंत ने कौन सा गुनाह कर डाला है? जिन्ना को महान ही तो बताया है। महान बताना क्या गुनाह है? जो काम कांग्रेस को करना चाहिए था उसे भाजपा ने करके 'अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार लीÓ। जसवंत ने नेहरू को विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराया है, लिहाजा कांग्रेस ने आपत्ति जताई थी। उसने पुस्तक में लिखी गई बातों को खारिज किया था लेकिन भाजपा ने तो जसवंत को ही खारिज कर दिया। अल्पसंख्यक वर्ग को अपने पक्ष में करने का एक बढिय़ा मौका खो दिया। खैर। इससे हमें कोई लेना देना नहीं है। यह उसका अंदरूनी मामला है। फिर भी भाजपा के हाव-भाव व क्रियाकलापों को देखने से लगता है कि अब उसमें भी निष्ठïा व नैतिक मूल्यों की कोई कीमत नहीं रह गई है तभी तो हमेशा राम के साथ रहने वाले 'हनुमानÓ को राम से ही अलग करने का प्रपंच रच डाला। उन्हें वनवास भेज दिया। इसे ही करते हैं कलियुग। यहां सब कुछ संभव है और इसे भाजपा ने कर दिखाया है।

Tuesday, August 18, 2009

आधा सच-आधा गप
जोर का झटका धीरे से

महंगाई के दर्द को झेल रही जनता के दर्दे-दिल को उस समय और जोर का झटका लगा जब प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने खराब मानसून का हवाला देते हुए आगे और महंगाई बढऩे का संकेत दे डाला। अब सुरसा के मुंह की तरह बढ़ रही इस महंगाई पर अंकुश लगे तो कैसे लगे? लेकिन सबसे अहम सवाल यह है कि आखिर इसके लिए दोषी कौन है? राज्य सरकार, केंद्र सरकार, जमाखोर, कालाबाजारी या कोई और...! हमारा तो मानना है कि इसके लिए जनता भी कम दोषी नहीं है। जब महंगाई इतनी बढ़ रही है तो इसे देख समझकर चीजों का इस्तेमाल करना चाहिए। जिनकी कीमतें भारी हैं उन्हें खाना ही क्यों? दाल, चीनी नहीं खाएंगे तो मर नहीं जाएंगे। जनता को तो दाल-चीनी लेने पर प्रतिबंध लगाने की मांग करनी चाहिए। वैसे भी भारत गांवों का देश है। कुल आबादी के 80 फीसदी लोग गांवों में ही रहते हैं और गांव वालों को तो 'नून-भातÓ से ही मतलब है। दाल-चीनी से उनका शायद ही वास्ता पड़ता होगा। खेत में कभी दाल की पैदावारी हो भी गई तो सीधे मंडी में बेच दिए जाते हैं। ऐसे में प्रतिबंध ही सबसे अच्छा उपाय है। 'न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरीÓ। पर उसे समझाए कौन? वह भी सरकार के सुर में सुर मिला रही है। मानसून को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। भला मानसून का इससे क्या वास्ता। वह तो अभी की बात है और ये महंगाई तो सालभर से लोगों का जीना मुहाल कर रखी है। ऐसे में सबसे अधिक दोषी कौन है? यह बताना मुश्किल है। इसके लिए या तो आयोग गठित करना चाहिए या फिर सीबीआई से जांच कराई जानी चाहिए ताकि दोषी कौन है? इसका पता चला सके। चूंकि हमारे देश में निष्पक्ष जांच के लिए ऐसे ही आयोग या सीबीआई जांच की मांग की जाती है, इसलिए यह जरूरी है। ताकि साल-दो साल का वक्त 'महंगाईÓ मामले में भी मिल सके। और वह अपना उल्लू सीधा कर सके। जब जांच रिपोर्ट आएगी तब 'दूध का दूध और पानी का पानी हो सकेगाÓ? पर यहां तो दूध और पानी दोनों से ही लोग जूझ रहे हैं। राष्टï्रीय राजधानी दिल्ली में जहां दूध के दाम फिर बढ़ा दिए हैं, वहीं इस भरी बरसात में पानी की किल्लत से लोगों को दो-चार होना पड़ रहा है और इसके लिए मानसून ही दोषी है। सचमुच मानसून रूठा हुआ है। लोगों ने उसे मनाने के लिए क्या-क्या नहीं किया। मेंढक-मेंढकी की शादी से लेकर हवन-यज्ञ तक किया और तो और छत्तीसगढ़ के कृषि मंत्री ने बकायदा भोले बाबा को जलाभिषेक किया लेकिन इंद्रदेव की नजरें इनायत ही नहीं हुई और होना भी नहीं चाहिए। जिस तरह से पर्यावरण का सत्यानाश किया गया है तो यह स्थिति तो आनी ही थी। कल की बजाए आज ही आ गई अब भगवान को याद करने से क्या फायदा। तुलसीदास ने रामायण में लिखा भी है। 'दुख में सुमिरन सब करै, सुख में करै न कोय, जो सुख में सुमिरन करै, तो दुख काहे को होयÓ सौ फीसदी सच है। आज सभी रामनाम की माला जप रहे हैं। यही काम पहले कर लिया होता तो इस तरह सूखे का यह दिन देखने को नहीं मिलता। अब बेवजह कभी मानसून को तो कभी भगवान को दोष देते अघा नहीं रहे। अच्छा होगा अपने अंतस में झांककर देखें। समस्याओं का खामियाजा तो जनता को ही भुगतना पड़ता है। नेताओं की चमड़ी तो मोटी होती है। उनको महंगाई, सूखे जैसी समस्याओं से कई लेना-देना नहीं है। यदि विपक्ष में बैठे हैं तो घडिय़ाली आंसू बहा लेते हैं। सत्तापक्ष के हों तो सिर पर हाथ फेर लेते हैं। हर चीज में राजनीति सूझती है। इसमें बुराई भी नहीं है। आखिर नेता बनते ही राजनीति करने के लिए हैं। लाखों-करोड़ों खर्च करने के बाद पद-प्रतिष्ठïा मिलती है। ऐसे में चमड़ी तो मोटी करनी ही होगी वरना ऐरे-गैरे भी पद प्रतिष्ठïा की दौड़ में शामिल हो जाएंगे।

आरक्षण ने हिलाए अंगदों के पाँव
एक बार फिर जनता-जर्नादन के दिन बहुरने वाले हैं। नगरीय निकाय चुनाव के लिए रणभेरी बजी भले ही न हो लेकिन आरक्षण की स्थिति स्पष्ट होते ही जहां दावेदारों में बेचैनी बढ़ गई है, वहीं आम जनता को एक बार फिर 'हरा ही हराÓ दिखने लगा है। चुनाव भले ही ठंड की ठिठुरन में होगा, लेकिन सावन की हरियाली उसे अभी से दिखने लगी है और दिखेगी भी क्यों नहीं पूरे पांच साल इसके लिए इंतजार जो किया है। लोकसभा-विधानसभा के चुनाव में तो जनता की पूछपरख नेताओं के चमचे सॉरी उनके पीए तक ही सीमित रह जाती है, लेकिन पंच-सरपंच और पार्षद-महापौर के चुनाव में जनता का उनसे सीधा संपर्क होता है, लिहाजा उनके लिए इससे अच्छा चांस और कुछ हो ही नहीं सकता। 'जो सोचे, सो पावैÓ की तर्ज पर वह अपनी सारी मुरादें इसी वक्त पूरा कर लेना चाहते हैं। यही वह समय होता है जब जनता वाकई में जनार्दन होती है और नेता याचक। यानी उनकी पांचों ऊंगलियां घी में होती है। सारी मुर्दें पूरी की जाती हैं और नहीं हुई तो फिर... भगवान जाने। ब्लैक मेलिंग से लेकर अनुनय विनय तक। क्या-क्या नहीं होते। नेता चाहे वह छोटा हो या बड़ा साम-दाम-दंड सारे भेद एक साथ प्रयोग करते हैं। लेकिन जो सफल हुआ उसकी चांदी बाकी की लुटिया डूबनी तय। अभी तक न तो चुनाव की घोषणा हुई है और न ही राजनीतिक पार्टियों में ऐसी कोई सुगबुगाहट है। प्रारंभिक प्रक्रिया प्रारंभ ही हुई है कि नेताओं की भुजाएं फड़कने लगी है। आरक्षण ने तो कई बड़े-बड़े धुरंधरों को ऐसी पटकनी दी है कि वह न घर का रहे न घाट का। फिर भी नए खुंटे की तलाश में जुट गए हैं। उनकी नजरें भटकने लगी हैं। यह दशा देख वर्षों से सपने संजोए बैठे लोगों की धड़कनें तेज हो गई हैं। उनका दिन का चैन और रात की नींद खराब होने लगी है। उठते-बैठते, सोते-जागते उन्हें यह डर सता रहा है कि कहीं वे तथाकथित बड़े नेता उनके क्षेत्र में न आ धमकें और यदि ऐसा हुआ तो फिर समझो उनका पत्ता साफ। लेकिन वे यह सोचकर मन मसोस रहा है कि 'दाने-दाने पर लिखा है, खाने वालों का नामÓ यदि हमारी किस्मत में लिखा होगा तो ये बड़़े नेताओं की क्या बिसात जो उनकी दावेदारी पर डाका डाल लें। खैर हमें क्या। हम तो सिर्फ देखने वाले हैं जो करना है उन्हीं लोगों को करना है। वार्ड पार्षद के आरक्षण के बाद का यह हाल है तो फिर महापौर का क्या होगा राम जाने। लेकिन अब इसके इंतजार की घडिय़ा भी खत्म हो गई हंै। अभी-अभी खबर मिली है कि महापौर के आरक्षण का भी पिटारा खुल गया है। राजधानी रायपुर का प्रथम नागरिक अब कोई महिला होंगी। राजनीतिक दलों में इस पर क्या रुख होगा वह तो अभी स्पष्ट नहीं हो सका है लेकिन अंदर ही अंदर यह मुद्दा सुलग रहा है। आरक्षण के पहले तक राजधानी में दावेदारों की बाढ़ आ गई थी। दोनों प्रमुख दलों के नेताओं के बीच वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई थी। भाजपा में वर्तमान महापौर के अलावा, सभापति, पूर्व सभापति व भाजयुमो अध्यक्ष के अलावा कई दावेदार ताल ठोंक रहे थे। अब उनकी उम्मीदों पर कुठाराघात हो गया है। इसी तरह कांग्रेस में कई दावेदार थे। विधायक तक महापौर बनने का ख्वाब देख रहे थे। लेकिन इस आरक्षण से दावादार सभी नेताओं को सांप सूंघ गया है। वे मौनी बाबा बन गए हंै। न तो कुछ निगलते बन रहा है न उगलते। यानी इसने उनके पैरों पर बेडिय़ा जड़ दी है। ठीक इसके उलट महिला नेत्रियों की चांदी ही चांदी हो गई है। उनके पैर अब जमीन पर नहीं पड़ रहे हैं। महापौर के सपने अब उनको हकीकत लगने लगे हैं। कई दावेदार अचानक सामने आने लगे हैं तो कई दमतार नेता अपनी जोरू को महापौर की टिकट दिलाने की जुगत में लग गए हंै। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि दोनों राजनीतिक पार्टियां किस पर दांव लगाएंगी और लाटरी किसकी लगेगी। जिसकी भी लाटरी लगे चाहे वह कांग्रेस की ओर से हो या फिर भाजपा की ओर से नफे में ही रहेंगे। चूंकि उनके साथ हार-जीत के साथ ही वर्चस्व का मामला भी जुड़ा होता है, लिहाजा टिकट पाना भी अपने-आप में बेहद अहम उपलब्धि माना जाता है और यही कारण है कि दावेदारों ने अभी से हाथ-पैर मारना शुरू कर दिया है। उनके दिलों की धुकधुकी अभी से बढ़ गई है। पार्टियां जंग जीतने की रणनीति बना रही हंै लेकिन आम जनता यानी मतदाता खुश हैं। उनके हाथों से नेताओं की तकदीर लिखने की शुभ घड़ी जो आने वाली है। कुछ को तो वे ठेंगा जरूर दिखाएंगे, जो पिछले 5 साल तक जनता को ठेंगा दिखाते रहे हैं तो कुछ के सिर पर ताज पहनाएंगे। बहरहाल एक बार फिर चुनावी पर्व का बेसब्री से इंतजार है ताकि महीने भर तक निश्चिंत होकर सारी सुख-सुविधाओं का भोग करने का शुभ अवसर मिल सके।

विशेष संपादकीय
जनशक्ति जागृत हो

देश को आजाद हुए 62 साल पूरे हो गए। आज ही के दिन 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ था। इसी की याद में हम सब भारतवासी प्रतिवर्ष इस दिन को राष्टï्रीय पर्व के रूप में मनाते हैं। आजादी कैसे मिली? इससे अब किसी को कोई मतलब नहीं रह गया है। राष्टï्रीय पर्व भी अब महज एक रस्म अदायगी हो गया है। नई पीढ़ी को इस पर्व की महत्ता नहीं मालूम। देश की आजादी के लिए प्राणों को न्यौछावर करने वाले वीर-शहीदों को भूल गए हैं जिनकी बदौलत हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं। आंदोलनों, सत्याग्रह, त्याग और बलिदान की गाथाएं इतिहास का हिस्सा बन चुकी हैं, उसे नई पीढ़ी को बताए जाने की जरूरत है ताकि वह आजादी के मर्म को समझ सकें। वरना उनके लिए यह सिर्फ जश्न मनाने का दिन बनकर रह जाएगा। हर वर्ष समरोह होता है, लेकिन वह सिर्फ यहीं तक सीमित न रहे। इसके आगे भी बहुत-कुछ है। हमेशा ऐसे अवसरों पर राजनेताओं द्वारा बड़ी-बड़ी बातें कही जाती हैं। कई योजनाओं की घोषणा की जाती है लेकिन इससे कुछ भी हासिल नहीं होने वाला। जब तक प्रत्येक व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों को समझकर कत्र्तव्यों का पालन देश के लिए नहीं करेगा तब तक हम अपने उद्देश्यों पर सफल नहीं हो सकेंगे।आजादी के इन 62 वर्षों में हमने 'क्या खोया-क्या पायाÓ यह एक बड़ा सवाल है। दिखने में तो लगता है कि हमने बहुत कुछ पाया है, लेकिन जो खोया है उसकी भरपाई कैसे होगी यह विचारणीय है। आज थल, जल और नभ तीनों क्षेत्रों में हमने कई ऐतिहासिक व गौरवशाली उपलब्धियां हासिल की हैं। परमाणु शक्ति संपन्न राष्टï्र होने के साथ ही हमने अग्नि, पृथ्वी जैसे घातक मिसाइलें तैयार किए हैं जो दुश्मनों के छक्के छुड़ाने में सक्षम है। समुद्र की गहराई नापने के साथ उस पर 5 कि.मी. लंबी पुल का भी निर्माण किया है। चंद्रमा में उपग्रह भेजकर पूरे विश्व को बता दिया कि भारत व भारत के नागरिक हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं। अब वह दिन दूर नहीं जब चंद्रमा पर हम स्वतंत्र रूप से कदम रख सकेंगे। बावजूद इसके कुछ ऐसी कमियां हैं, जिसे दूर नहीं किया गया तो देश में अराजकता का माहौल पैदा हो जाएगा। नैतिक व चारित्रिक पतन के अलावा इन 62 वर्षों में सांप्रदायिकता, जातिवाद व संकीर्णता इस कदर हावी हो गई है कि लोग आपस में एक-दूसरे से ऐसा व्यवहार करने लगे हैं मानों वे एक देश के निवासी नहीं हैं। जातिवाद समाज की समरसता और सामंजस्य में जहर घोल रहा है। समाज में सामाजिक तथा आर्थिक विषमताओं के चलते फूट डालने वाले तत्व सक्रिय हो गए हैं। जब तक इन विषमताओं को खत्म करने की दिशा में कदम नहीं उठेंगे तब तक ऐसे तत्व राज करते रहेंगे। इसके लिए जनता को आगे आना होगा। राजनीतिक दलों की भी इसमें भागीदारी होनी चाहिए ताकि गरीब-अमीर, अगड़ा-पिछड़ा का भेदभाव खत्म करने के प्रयास हो सके। सबसे बड़ी कमजोरी आज राजनीतिक दलों में देखी जा रही है। सत्ता भ्रष्टïाचार का सबसे बड़ा केन्द्र बनी हुई है। राजनीति कभी सेवा का माध्यम हुआ करती थी आज सत्ता हथियाने का साधन बनी हुई है। सत्ता तो सेवा के लिए होना चाहिए लेकिन उसे भोग की वस्तु बना दी गई है। राजनीति से ही सारी बुराइयां फैल रही हैं। देशवासियों का खुलकर शोषण-दोहन किया जा रहा है। ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक बाहुबल और धनबल का बोलबाला दिखने लगा है। जबकि देश का भाग्यविधाता मौन साधे बैठा हुआ है या यूं कहें कि वह सहन कर रहा है। हिंदुस्तान को यदि हिंदुस्तान रहने दिया जाए तो सब-कुछ ठीक हो जाएगा लेकिन कुछ ऐसे लोग हैं जो यह नहीं चाहते। दरअसल भ्रष्टïाचार ने सारी प्रगति को चाहे वह विचारों, सिद्धांतों या नीतियों की ही क्यों न हो जकड़ लिया है। जब तक इस जकडऩ को तोड़ा नहीं जाएगा तब तक सफलता नहीं मिलेगी।वर्तमान में केन्द्र में यूपीए सरकार ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाई है। जनता का उसे भरपूर स्नेह मिला है। लेकिन महंगाई व सूखा उसके लिए एक बड़ी चुनौती है। दूसरी बार सत्ता संभालने वाले अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह इससे कैसे निपटेंगे यह अहम सवाल है। ठीक इसी तरह नवोदित राज्य छत्तीसगढ़ में लगातार दूसरी बार सत्ता संभालने वाले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को चौतरफा चुनौतियाँ मिल रही हैं। महंगाई, सूखे के साथ नक्सलवाद एक गंभीर समस्या है। प्रदेश के लिए नासूर बन चुकी इस समस्या से निपटना राज्य सरकार की पहली प्राथमिकता होगी। इसके लिए प्रदेश के साथ-साथ केन्द्र सरकार ने भी हर तरह से सहायता देने का ऐलान किया है।अंत में हम कहना चाहते हैं कि आजादी के इन 62 सालों में देश ने जितना पाया है उतना खोया भी है। स्वतंत्रता का लाभ अभी तक देश के सुदूर क्षेत्रों में नहीं पहुंच पाया है। राजनीति के काले धुएं ने सबको अंधेरे में रखा है जब तक इसे हटाया नहीं जाएगा तब तक इसका लाभ सभी तक नहीं पहुंच पाएगा। इसके लिए सभी को आगे आना होगा। जाति, धर्म, संप्रदाय को परे रखकर जनशक्ति को जागृत होना होगा। साथ ही यह भावना जरूर रहे कि देश देशवासियों का है। स्वतंत्रता से ही हमारी आन-बान-शान है। इसे किसी भी तरह से आंच न आने दें यह संकल्प लें।

Tuesday, August 4, 2009

'ऊँगली कटाकर शहीद होने की चाहतÓ


'ऊँगली कटाकर शहीद होने की चाहतÓ
देश में इन दिनों पक्ष-विपक्ष के बीच धींगा-मस्ती का खेल चल रहा है। दोनों अपने में मस्त हैं। न तो आम जनता का ख्याल है और न ही देश के मान-सम्मान और साख का। सरकार ब्लूचिस्तान मामले से पल्ला झाडऩे का प्रयास कर रही है तो विपक्ष उसे घेरने पर आमादा है, लेकिन इन सबके बीच भी और कई ऐसे मुद्दे हैं, जिस पर किसी का ध्यान नहीं है और यही वजह है कि दोनों आम जनता से दूर होते जा रहे हैं। आम जनता का ख्याल किसी को नहीं है। उसे तो कौडिय़ों के मोल समझा जाता है और समझना भी चाहिए। आखिर उसकी बखत ही क्या है। वह कभी सुधर भी नहीं सकती। उनका काम सिर्फ और सिर्फ चिल्लाना है। इसके अलावा वह कुछ कर भी नहीं सकती। यह उनकी आदत हो चुकी है और सभी इसे जान-समझ चुके हैं, लिहाजा उसके चिल्लाने से किसी के कानों में जूं तक नहीं रेंगती। आजकल महंगाई को लेकर वह कितना चिल्ला रही है। हाय-तौबा मचा रही है लेकिन फायदा क्या? कुछ भी नहीं। ऊपर से महंगाई सप्ताह दर सप्ताह बढ़ती ही जा रही है। इससे तो अच्छा होता कि चुप रहती। वैसे भी चुप रहने में ही समझदारी होती है। वह तो बेचारी है ही। आखिरकार वह थक हारकर चुप बैठ ही जाती है लेकिन इन दिनों ब्लूचिस्तान को लेकर जिस तरह से संसद के अंदर और बाहर नूरा-कुश्ती जारी है। उसे देखते हुए उसका चुप रहना उचित नहीं है। दरअसल प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का मिस्र के शर्म अल शेख शहर में पाक प्रधानमंत्री गिलानी के साथ भेंट के बाद जो साझा बयान जारी किया गया था उसे लेकर ही यह सारा बवाल मचा हुआ है। हालांकि सरकार इसे एक पक्षीय बताकर उससे पल्ला झाडऩे का प्रयास कर रही है लेकिन मामला गंभीर है। मुंबई हमलों के बाद आतंकवाद को जड़-मूल से खत्म करने के लिए प्रधानमंत्री प्रतिबद्ध थे। उनकी सरकार ने पाकिस्तान पर राजनीतिक और कूटनीतिक दबाव डालकर उसे यह स्वीकार करने पर मजबूर किया था कि मुंबई के हमलावर पाकिस्तानी थे और हमले की साजिश पाकिस्तान में ही रची गई थी। अंतर्राष्टï्रीय समुदाय के बीच भी वह अलग-थलग पड़ा था। भारत हमलावरों पर कार्रवाई और पाकिस्तान में आतंकवादी ढांचा तहस-नहस किए बिना उसके साथ कोई संबंध रखने को तैयार नहीं था लेकिन अचानक वार्ता की शुरूआत कर दी गई। यह सब क्यों? न तो पाकिस्तान ने अपने वादों को निभाया है और न ही भारत की शर्तें मानी है। फिर भी इतनी दयालुता? यह समझ से परे है। वैसे सरकार संसद पर हमले और कारगिल युद्ध के बाद भी दो बार पाकिस्तान से वार्ता नहीं करने का ऐलान करने के चंद महीनों बाद ही वार्ता की मेज पर जाने का पराक्रम कर चुकी है। इसलिए उसमें आश्चर्य की जरूरत नहीं थी। लेकिन विपक्ष को कौन समझाए वह तो हाथ-मुंह धोकर ऐसे पीछे पड़ गया है कि उसे इसके अलावा कोई दूसरा मुद्दा ही नहीं दिख रहा है। ठीक है यह देश की सुरक्षा से जुड़ा मसला है लेकिन इसकी जिम्मेदारी तो सरकार की है बेवजह वह बात का बतंगड़ बनाने पर तुला हुआ है। वह अब देश की साख और सुरक्षा का झंडा बुलंद करना चाह रहा है। लगता है 'ऊंगली काटकर शहीद होनेÓ वाली कहावत को चरितार्थ करना चाह रहा है। खैर! हमें क्या यह तो विपक्ष जाने पर जनता को भी अपनी जिम्मेदारी निभाने आगे आना चाहिए। कब तक वह 'बेचारीÓ रहेगी। अब तक तो राजनेता इसी का फायदा उठाते रहे हैं। इसी का नतीजा है कि आज दाल और आलू-प्याज जैसी आमजन की सब्जियां भी थाली से दूर होने लगी हैं। जमाखोरी, कालाबाजारी व कमीशनखोरी के चंगुल से जब तक निजात नहीं मिलेगी यह स्थिति बनी रहेगी।
नैतिक साहस दिखाएं बूटा
राजनीति जनसेवा का साधनÓ है यह एक शाश्वत सत्य है, लेकिन आज कितने राजनेता हैं, जो इस शाश्वत सत्य पर चल रहे हैं, ऐसे नेताओं को अंगुली पर गिने जा सकते है। राजनीति आज अपने मूल उद्देश्यों से भटक चुकी है और इसका जीता-जागता उदाहरण राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष बूटा सिंह हैं, जो दामन पर दाग लगने के बावजूद पद छोडऩे को तैयार नहीं है। मामला उनके बेटे से जुड़ा हुआ है। उनका बेटा सरबजीत उर्फ स्वीटी एक करोड़ रुपए की रिश्वतखोरी के आरोप में सीबीआई की हिरासत में है। रिश्वत के एवज में मामला रफा-दफा करने का आश्वासन राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग से संबंधित है इसलिए इसे बूटा सिंह से जोड़कर देखा जा रहा है। बावजूद बूटा सिंह नैतिकता को दरकिनार कर इस्तीफा देने को तैयार नहीं है। बल्कि वे इसे एक राजनीतिक षडयंत्र बताते हुए इसे अपने स्तर पर सुलझाने में लगे हैं। उन्होंने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री से बात करने के अलावा आवश्यक दस्तावेज फैक्स करने की बात कही है। उन्होंने सीबीआई के रवैये पर भी सवाल खड़ा किया और कहा कि मेरे बेटे और मुझे निशाना बनाया जा रहा है। बूटा सिंह की बात अपनी जगह सच हो सकती है, लेकिन उन्हें चाहिए कि वे नैतिकता के नाते पद से इस्तीफा देकर कानूनी लड़ाई लड़े और जनता को वास्तविकता से रूबरू कराए। आखिर वे पद क्यों नहीं छोडऩा चाहते? यह सच्चाई सामने लाने का सर्वोत्तम तरीका है। लेकिन वे ऐसा नहीं कर रहे। इसे क्या कहा जाए। निश्चित रूप से यह राजनीति के गिरते स्तर का द्योतक है। वैसे बूटा सिंह कोई पहले व्यक्ति नहीं हैं, जो इस तरह की बातें कह रहे हैं। कई ऐसे राजनेता भी हुए हैं, जो इस्तीफा देने से कतराते रहे हैं। निश्चित रूप से यदि राजनीति को सेवा का माध्यम बनाना है तो सार्वजनिक जीवन में नैतिकता और शुचिता जैसे उच्च मापदंडों को पुनस्र्थापित करना होगा। चूंकि बूटा सिंह आज संवैधानिक पद पर आसीन हैं, वे देश के गृहमंत्री भी रह चुके हैं, इसलिए यह और भी महत्वपूर्ण हो गया है कि वे इस मुद्दे पर कोई शीघ्र निर्णय लें। वैसे देश में कई राजनीतिज्ञ ऐसे भी हुए हैं, जिन्होंने उच्च नैतिक मापदंड को बनाए रखा है। अभी हाल ही में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने पीडीपी के आरोप पर विधानसभा में इस्तीफे की घोषणा कर नैतिकता की उच्च परंपरा को और पुष्ठï किया है। यह सच है कि राजनीति में पारदर्शिता अब बीते दिनों की बात हो गई है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि नैतिकता को तिलांजलि दे दी जाए। अच्छा होगा बूटा सिंह इस्तीफा देकर नैतिकता के उच्च प्रतिमानों के शिखर पर अपने आपको स्थापित कर लें। यह उनके लिए एक अच्छा अवसर है। सच्चाई सामने आ ही जाएगी।

Monday, August 3, 2009

वाडा पर विवाद

वाडा पर विवाद
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने अपने खिलाडिय़ों का समर्थन करते हुए विवादास्पद वाडा (वल्र्ड एंटी डोपिंग एजेंसी) के कुछ शर्तों को नामंजूर कर दिया है। इस फैसले से बीसीसीआई और आईसीसी के बीच टकराव की स्थिति निर्मित हो गई है। इस स्थिति में टीम इंडिया चैंपियंस ट्राफी से बाहर हो सकती है लेकिन बीसीसीआई का यह निर्णय सराहनीय है। दरअसल न तो खिलाड़ी और न ही बीसीसीआई डोपिंग के विरोधी हैं, लेकिन जिस तरह से इस नियम के तहत टूर्नामेंट से बाहर की जाने वाली जांच के लिए खिलाडिय़ों को तीन महीने पहले उपलब्धता की जानकारी देने की बात कही गई है वह किसी के गले नहीं उतर रही। इसके अलावा वह धारा जिसका विरोध कर रहे हैं, वह किसी भी नजरिए से उचित नहीं है। यह अतार्किक, भारतीय संविधान का उल्लंघन और निजी जिंदगी में दखल है। खिलाड़ी सुरक्षा घेरे में रहते हैं और इसके रहते वे अपनी उपलब्धता का खुलासा नहीं कर सकते और सबसे महत्वपूर्ण है हमारा संविधान प्रत्येक व्यक्ति की निजता की गारंटी देता है। ऐसे में 365 दिन में प्रत्येक दिन के 24 घंटे तक किसी की निजता में दखल नहीं कर सकते। अब इस मुद्दे पर आईसीसी का क्या रुख होगा यह बाद में पता चलेगा लेकिन बीसीसीआई ने उसे हैरानी में जरूर डाल दिया है। चूंकि अन्य टेस्ट खेलने वाले देशों के ज्यादातर क्रिकेटरों ने इस संहिता पर हस्ताक्षर करने में सहमति जता दी है। ऐसे में बीसीसीआई और आईसीसी के बीच विवाद का संकेत है। वैसे भी हाल ही में कई ऐसे मौके आए जब दोनों के बीच टकराव की स्थिति बनी है। यहां यह बताना लाजिमी है कि क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों के खिलाड़ी भी इसका विरोध कर रहे हैं। दिग्गज टेनिस खिलाड़ी राफेल नडाल और एंडी मरे इसका खुलकर विरोध कर चुके हैं। मरे ने इस नियम को 'क्रूरÓ करार दिया था जबकि महिला टेनिस खिलाड़ी सेरेना विलियम्स ने कहा था कि अब तो हदें पार हो गईं। फुटबाल कोच एलेक्स ने इसे सरदर्द बताया था। बेल्जियम के 65 खिलाडिय़ों ने इसे कानूनी चुनौती दी थी। वाडा नियम को लेकर सबसे कड़ी टिप्पणी अमरीकी धावक लोलो जोंस और महिला विश्वकप स्कीइंग चैम्पियन ंिलंडसेवान ने की थी। फीफा और यूएफा ने इस साल मार्च में बैठक करके इसे नामंजूर कर दिया था जिसके बाद फुटबाल पर ओलंपिक खेलों से बाहर होने का खतरा मंडराने लगा था। यूरोपीय यूनियन के खेल आयुक्त जान फिजेल ने वाडा के इस नियम को हटाने के लिए कहा था जो एक जनवरी से लागू हो गया था। बहरहाल आईसीसी ने बीसीसीआई के साथ किसी भी तरह के टकराव का खंडन किया है और कहा है कि इसका व्यवहारिक और स्वीकार्य समाधान निकाला जाएगा। यदि ऐसा होता है तो यह खिलाड़ी और क्रिकेट दोनों के हित में है। वैसे भी डोपिंग एक समस्या है और इसे कतई बर्दाश्त नहीं कर सकते, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि खिलाडिय़ों की निजी जिंदगी प्रभावित हो। अच्छा होगा इस मुद्दे पर सर्वमान्य हल निकाला जाए ताकि बेवजह की छिड़ी बहस पर विराम लग सके।

राजनेताओं की ओछी राजनीति
कश्मीर की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। लेकिन इस बार की राजनीति जिस निचले स्तर पर हो रही है। उसे जायज नहीं ठहराया जा सकता। नेताओं ने सारी नैतिकता को ताक में रखकर विधानसभा में जिस तरह से एक-दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हैं वह न केवल सदन की मर्यादा के खिलाफ है बल्कि भारतीय संस्कृति व सभ्यता के भी प्रतिकूल है। इस तरह के व्यवहार को कदापि उचित नहीं ठहराया जा सकता। पीपुल्स डेमोक्रटिक पार्टी के नेता मुजफ्फर बेग ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर सैक्स कांड में शामिल होने का आरोप विधानसभा में लगाया, यह घटिया राजनीति का जीता-जागता उदाहरण है। पीडीपी यह कैसे भूल गई कि जब सैक्स कांड का खुलासा हुआ उस समय जम्मू-कश्मीर में उसकी सरकार थी। उसने इसका खुलासा उस समय क्यों नहीं किय। दरअसल यह सब एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा मालूम पड़ता है। वैसे भी यह मामला सीबीआई के सुपुर्द है और सीबीआई ने कभी भी इस मामले में उमर अब्दुल्ला के लिप्त होने की बात नहीं कही बावजूद पीडीपी का इस तरह विधानसभा में आरोप लगाना उसकी राजनैतिक हताशा को दर्शाता है। यह एक ऐसे व्यक्ति के दामन पर दाग लगाने का प्रयास है, जो उस प्रदेश का मुखिया है। उनके साथ लाखों-करोड़ों जनता की आस्था जुड़ी हुई है। ऐसे में पीडीपी को इस तरह का आरोप नहीं लगाना चाहिए था। लेकिन उमर अब्दुल्ला की तारीफ करनी चाहिए जिन्होंने इस आरोप के तुरंत बाद इस्तीफे की घोषणा कर उच्च नैतिक मापदंड का अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया है। लेकिन उनकी पार्टी के लोग भी पीडीपी की तरह ओछी राजनीति में उतर आए हैं। मुजफ्फर बेग के चरित्र पर ऐसे-ऐसे लांछन लगाए है, जो सारी शर्मो-हया को पीछे छोड़ दिया है। ऐसे में यह कहना कि सभी राजनति दल एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। सौ फीसदी सच है। जिनको जब समय मिलता है अपना भड़ास निकाल लेता है। उनको न तो कोई मर्यादा या तहजीब की चिंता है और न ही देश व समाज की संस्कृति व सभ्यता की। एक -दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ में राजनतिक नेता मनमानी में उतर आए है। उन्हें अब किसी का डर नहीं रहा है। देश के संविधान व कानून की इस तरह धज्जियां उड़ाते हैं मानो वह इनके रहमो करम पर हो, ऐसे राजनेताओं पर लगाम लगानी ही चाहिए। यह केवल कश्मीर का ही मामला नहीं है। कमोबेश देश के हर राज्यों में इस तरह की हरकत दिखाई देने लगी है। उत्तरप्रदेश, बिहार की विधानसभाओं में मारपीट की घटनाएं भी हो चुकी है। लेकिन कश्मीर में अभी जो कुछ भी हुआ है। वह भारतीय संविधान की मान्य परंपराओं के विपरीत है। ऐसी घटनाओं से बचा जाना चाहिए। देश की जनता अच्छा-बुरा सब समझती है और वक्त आने पर राजनेताओं को मजा जरूर चखाएगी। दरअसल इस सबके पीछए राजनीति का अपराधीकरण का भी बड़ा हाथ है। जब तक संसद व विधानसभाओं में गुंडे-बदमाश और भ्रष्टïाचारी आते रहेंगे लोकतंत्र की धज्जियां उड़ती रहेगी। अच्छा होगा इस रह की राजनीति करने वालों के लिए कानून बनाए जाए ताकि कोई भी इस तरह की हरकत करने की हिमाकत न कर पाएं।

Thursday, July 30, 2009

न माया मिली न राम


न माया मिली न राम
आधा सच आधा गप

छत्तीसगढ़ में इन दिनों कानून व्यवस्था की स्थिति को लेकर सरकार पर चौतरफा हमला हो रहा है। फिर वह विधानसभा हो या फिर सभी जगह सरकार को आलोचनाओं से दो-चार होना पड़ रहा है। कांग्रेस तो हाथ-मुंह धोकर पीछे पड़ गई है। तीन दिन तक विधानसभा की कार्रवाई नहीं चलने दी। निश्चित रूप से मानपुर में नक्सली हिंसा के खिलाफ उसका उग्र रूप काबिल-ए-तारीफ है। लेकिन भाजपा की भी तारीफ करनी होगी खासकर मुख्यमंत्री रमन सिंह की जिनके कानों में जूं तक नहीं रेगी और एकदम अक्खड़ की तरह मैदान में डटे रहे। कांग्रेसी उठते-बैठते, सोते-जागते, हर समय मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग करते रहे। यहां तक कि नींद में भी मुख्यमंत्री के इस्तीफे के सपने उन्हें दिखने लगे थे लेकिन मुख्यमंत्री के एक बयान ने उनके खेलों पर पानी फेर दिया। मुख्यमंत्री ने न केवल इस्तीफा देने से इंकार कर दिया बल्कि यह कहकर कि 'मुझसे पहले ही दिन टेलीफोन करके पूछ लिया होता तो मैं उन्हें बता देता कि मैं इस्तीफा नहीं दे रहा हूं। चार दिन तक प्रदर्शन की जरूरत ही नहीं थी। यदि ऐसा करना ही है तो मैं पूरे पांच साल इस्तीफा नहीं देने वालाÓ उनकी बोलती बंद कर दी। कांग्रेसियों को भी समझ में आ गया कि अब उनकी दाल नहीं गलने वाली, लिहाजा सीधे पटरी पर लौट आए। आव देखा न ताव और ऐसा क्या सूझा कि मुख्यमंत्री से इस्तीफे की मांग करने लगे थे। जबकि उन्हें चाहिए था कि वे नक्सली हिंसा जैसे गंभीर विषय पर सदन में सरकार से जवाब मांगते और लचर होती कानून व्यवस्था को सुधारने दबाव डालते लेकिन ऐसा नहीं हो सका। और जब सदन में चर्चा हुई तब तक बहुत देर हो चुकी थी। एक गंभीर और मजबूत विपक्ष की भूमिका गौण हो गई। सरकार तो बहुमत में है ही। अपना सरकारी कामकाज आराम से निपटा लिया। न केवल नक्सलवाद पर चर्चा कराई, बल्कि अनुपूरक बजट को भी पारित करवा लिया। वह भी बगैर विपक्ष के। कांग्रेस को इस तरह का फैसला लेने से पहले गंभीरता से सोचना चाहिए था। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन जिस तरह से विधानसभा में अनुपूरक बजट जैसे कई महत्वपूर्ण सरकारी कामकाज बिना किसी चर्चा के पारित करवा लिया गया। इसके लिए सरकार नहीं बल्कि कांग्रेस खुद दोषी है। बात तो बड़ी-बड़ी कर रहे थे। मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग पर तीन दिनों तक अडिग रहे। राष्टï्रपति शासन तक की गुहार लगाई गई। लेकिन हासिल आया शून्य। जनता के दरबार में भी उनकी रेटिंग बढ़ी होगी ऐसा नहीं लगता। 'न माया मिली न रामÓ वाली कहावत पूरी तरह चरितार्थ हो गई है। वह एक सक्षम विपक्ष की भूमिका निभाने में भी असफल हो रही है। एक बात यह अच्छी दिखी कि अब उसमें एकता दिखने लगी है। बड़े नेता भी इसका राग अलाप रहे हैं। भले ही यह दिखावे के लिए ही क्यों न हो लेकिन इतने भर से ही भाजपाइयों के हाथ-पांव फूलने लगे थे। लेकिन 'नाच न आवै आंगन टेढ़ाÓ की कहावत चरितार्थ हो गई है। वे इस एकता (दिखाने के लिए ही सही) को संजोकर भी नहीं रख सके। और यदा-कदा उकी पोल खुलती दिख ही जाती है। फिर भी कईयों के चेहरों पर खुशी झलक रही थी। यह खुशी उबाल भी मारने लगी थी। वे कह रहे थे-काश। चुनाव के समय ऐसी एकता रहती। पर उन्हें कौन बताए कि ऐसी एकता चुनावों में भी थी पर दिखाई नहीं दी। तभी तो भाजपा की चारों ऊंगलियां अभी घी में है वरना सर कड़ाही में होता। इसीलिए तो हम कहते हैं कि गुटों में बंटी कांग्रेसियों को ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है। वह महज एक गुब्बारे की तरह है, कब फूट जाए पता ही नहीं चलता।