नौसेना एटमी ताकत से लैस
भारत पहली स्वदेशी परमाणु ऊर्जा से चलित पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत (दुश्मन का नाश) के जलावतरण के साथ रूस, चीन, फ्रांस व ब्रिटेन के बाद यह क्षमता हासिल करने वाला छठा देश बन गया है। अब यह थल और आकाश के बाद गहरे समुद्र के भीतर से परमाणु हमले का करारा जवाब दे सकता है। नि:संदेह भारत के लिए यह बेहद अहम उपलब्धि है तथा नौ सेना के क्षेत्र में उसने एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर पार कर लिया है। इस परमाणु पनडुब्बी का परीक्षण अभी डेढ़ साल तक चलेगा और उम्मीद है कि यह 2011 तक पूरी तरह काम करने लायक हो पाएगी। भारत की सुरक्षा के लिहाज से समुद्री सीमाएँ बेहद अहम होती जा रही हैं और सैन्य तैयारी को बदलते परिवेश में ढालना बेहद जरूरी है। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भी कहा है कि सरकार राष्ट्रीय हितों और भौगोलिक अखंडता की रक्षा के लिए वचनबद्ध है। उन्होंने कहा कि हमारा तेवर आक्रामक नहीं है और न हम किसी को डराना चाहते हैं। हम अपनी सेेनाओं के आधुनिकीकरण के लिए लगातार काम करते रहेंगे, जिससे वे नवीनतम प्रौद्योगिकी से लैस रहें। उल्लेखनीय है कि पूर्णत: स्वदेश में निर्मित पनडुब्बी अरिहंत को परमाणु ईंधन से चलने के कारण बार-बार ईंधन व आक्सीजन लेने के लिए समुद्र के भीतर से बाहर आने की जरूरत नहीं है। समुद्र के भीतर 500 मीटर नीचे तक लंबे समय तक रहने में वह सक्षम है। साथ ही समुद्र में सतह के नीचे प्रति घंटा 22 से 28 समुद्री मील तक दौडऩे में सक्षम है। फिलहाल इसमें 700 कि.मी. तक मार करने वाली एक दर्जन के -15 मिसाइलें होंगी। आने वाले समय में 3500 कि.मी. तक मार करने में सक्षम के-एक्स मिसाइल तैनाती की योजना है। इसमें क्रूज मिसाइल भी तैनात की जा सकेंगी। पनडुब्बी में परमाणु ईंधन के जरिए 85 मेगावाट बिजली उत्पादन के संयंत्र भी मौजूद हैं। नौसेना की योजना अगले 20 सालों में ऐसी 10 पनडुब्बियों के निर्माण की है। यहां यह बताना लाजिमी है कि अरिहंत का स्वप्न पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने 39 साल पहले देखा था। उन्होंने 1970 में नौ सेना व भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र को इस पर काम करने कहा था। तकनीकी रूप से परमाणु ईंधन चलित प्रणालियाँ तैयार करने की योजना 60 के दशक में बन गई थी। हालांकि इंदिरा गांधी के सपने को साकार करने का काम 1984 में एडवांस वैसल कार्यक्रम के तहत शुरू हो पाया। बहरहाल हमारे वैज्ञानिकों की इस महत्वपूर्ण उपलब्धि पर पूरे देशवासियों को गर्व है। उन्हें इस नई एटमी ताकत पर ढेरों बधाइयां व शुभकामनाएं।
Monday, July 27, 2009
राखी का स्वयंवर और राजनीति

राखी का स्वयंवर और राजनीति
देश में इन दिनों प्यार, तकरार, संवाद, एक्शन, रोमांच सभी कुछ देखने-सुनने को मिल रहा है। यानी कि जनता के मनोरंजक के लिए भरपूर मसाला है। एक ओर राखी का स्वयंवर है तो दूसरी ओर समलैंगिकता का सवाल। वहीं राजनीतिज्ञों का राजनीतिक बवाल भी कम मनोरंजन नहीं है। मतलब सब कुछ यहीं है। राखी के स्वयंवर के बहाने जो शो दिखाया जा रहा है वह बेहद लोकप्रिय हो गया है। इस शो में न केवल राखी से ब्याह रचाने वाले युवक हैं बल्कि उनकी मां भी पूरे चमक-दमक से राखी सॉरी अपनी बहू से बतियाते नजर आती है। अब यह देखना दिलचस्प है कि राखी किनकी बहू बनेगी। अब तक तो 16 कुंवारे में से सिर्फ 5 ही बचे हैं। यानी फिलहाल इन पांच पांडव में राखी द्रौपदी की भूमिका में है। राखी ने बकायदा इन पांचों के लिए करवाचौथ का व्रत भी रखा। पांचों युवकों ने भी अपनी पतिव्रता पत्नी के सामने पत्नीव्रता होने का सबूत देने के लिए व्रत रखा। लेकिन इसमें इन युवकों की माताओं का शामिल होना इसे और रोचक बना गया। पांच में से 4 की माताओं ने अपनी भावी बहू और बेटों का व्रत खुलवाया। यह सब देखने-सुनने में अटपटा जरूर लगता है पर है सौ फीसदी सच। फिलहाल राखी पांच पांडव रूपी कुवारों की पत्नी द्रौपदी के रूप में जिस तरह बुद्धूबक्सा पर अवतरित होती है वह किसी परी की कथा की तरह रोमांचकारी से कम नहीं है। लोग चटखारे ले लेकर इसे देखते ही नहीं बल्कि मजा भी लेेते हैं और लेेंगे भी क्यों नहीं आखिर राखी है ही कमाल की। अपने पुराने दोस्त अभिषेक को थप्पड़ जडऩे के बाद सुर्खियां बटोरने वाली राखी हमेशा मीडिया की चहेती रही है और आज भी वह मीडिया में छायी हुई है। यह नुस्खा राखी के अलावा और किसी को आता तो वह राजनेताओं के अलावा दूसरा कोई हो नहीं सकता। आजकल राजनेताओं को भी मीडिया में छाने का चस्का लगा हुआ है। फिर चाहे वह तरीका गलत ही क्यों न हो। उत्तरप्रदेश में रीता बहुगुणा जोशी ने मायावती को ऐसा क्या कह डाला कि रातों-रात वह स्टार से सुपरस्टार हो गई। राष्टï्रीय क्या अंतर्राष्टï्रीय मीडिया की सुर्खियां बन गई। जो बात रीता ने अभी कही है। कमोबेश कुछ इसी अंदाज में पूर्व में मायावती ने मुलायम सिंह के राज में कही थी तब इतना बखेड़ा खड़ा नहीं हुआ था। अभी तो सोनिया जी तक को सामने आना पड़ा। उन्हें खेद जतानी पड़ी। बावजूद बसपाइयों ने बहनजी के इशारों पर वह सब कुछ कर डाला जो नहीं करना चाहिए। रीता बहुगुणा के घर तक को जला डाला। राजनीति में शुचिता का राग अलापने वालों के राज में बहनजी के भाइयों ने जो कहर बरपाया है वह कदापि उचित नहीं है लेकिन कहते हैं राजनीति में सब जायज है। कभी बहनजी ने भी यह सब भोगा है तो उसका बदला तो लेना ही था। और जब सत्ता हाथ में हो तो बदला लेने का इससे अच्छा अवसर और कब मिलेगा? सो वे चुन-चुनकर बदला ले रही हंै। वैसे यह तो होना ही था। जैसे को तैसा वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। मुलायम राज की सतायी बहनजी अपने राज में पूरा सूद सहित वसूल रही हंै लेकिन उनको धैर्य भी रखना चाहिए आखिर ऊपर वाला सब कुछ देख-समझ रहा है। यदि उसका ब्रम्हास्त्र चल गया तो न तो बहन जी रहेंगी और न ही उनकी सत्ता। फिर हमें क्या हम तो सिर्फ बोल सकते हैं। खैर बात यही खत्म करें लेकिन क्यों? राजनीति के धुरंधर हर चीज में राजनीति ढूंढते हैं। अब देख लें हाईकोर्ट ने समलैंगिकता को कानूनी मान्यता क्या दी बवाल खड़ा हो गया। नेता-अभिनेता को तो छोड़ दें मुल्ला-मौलवी से लेकर बाबाओं तक की भुजाएं फड़कने लगी है लेकिन मामला कोर्ट में है, लिहाजा न तो बाबाओं की चलेगी और न ही नेताओं की। सब कुछ अब उन पर निर्भर है यानी कोर्ट पर। फिर भी इनकी चिल्लपों थम नहीं रही है। अच्छा भी है इसी बहाने चर्चा में जो हैं और राजनीति के लिए यह जरूरी भी है।
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