Monday, August 3, 2009

वाडा पर विवाद

वाडा पर विवाद
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने अपने खिलाडिय़ों का समर्थन करते हुए विवादास्पद वाडा (वल्र्ड एंटी डोपिंग एजेंसी) के कुछ शर्तों को नामंजूर कर दिया है। इस फैसले से बीसीसीआई और आईसीसी के बीच टकराव की स्थिति निर्मित हो गई है। इस स्थिति में टीम इंडिया चैंपियंस ट्राफी से बाहर हो सकती है लेकिन बीसीसीआई का यह निर्णय सराहनीय है। दरअसल न तो खिलाड़ी और न ही बीसीसीआई डोपिंग के विरोधी हैं, लेकिन जिस तरह से इस नियम के तहत टूर्नामेंट से बाहर की जाने वाली जांच के लिए खिलाडिय़ों को तीन महीने पहले उपलब्धता की जानकारी देने की बात कही गई है वह किसी के गले नहीं उतर रही। इसके अलावा वह धारा जिसका विरोध कर रहे हैं, वह किसी भी नजरिए से उचित नहीं है। यह अतार्किक, भारतीय संविधान का उल्लंघन और निजी जिंदगी में दखल है। खिलाड़ी सुरक्षा घेरे में रहते हैं और इसके रहते वे अपनी उपलब्धता का खुलासा नहीं कर सकते और सबसे महत्वपूर्ण है हमारा संविधान प्रत्येक व्यक्ति की निजता की गारंटी देता है। ऐसे में 365 दिन में प्रत्येक दिन के 24 घंटे तक किसी की निजता में दखल नहीं कर सकते। अब इस मुद्दे पर आईसीसी का क्या रुख होगा यह बाद में पता चलेगा लेकिन बीसीसीआई ने उसे हैरानी में जरूर डाल दिया है। चूंकि अन्य टेस्ट खेलने वाले देशों के ज्यादातर क्रिकेटरों ने इस संहिता पर हस्ताक्षर करने में सहमति जता दी है। ऐसे में बीसीसीआई और आईसीसी के बीच विवाद का संकेत है। वैसे भी हाल ही में कई ऐसे मौके आए जब दोनों के बीच टकराव की स्थिति बनी है। यहां यह बताना लाजिमी है कि क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों के खिलाड़ी भी इसका विरोध कर रहे हैं। दिग्गज टेनिस खिलाड़ी राफेल नडाल और एंडी मरे इसका खुलकर विरोध कर चुके हैं। मरे ने इस नियम को 'क्रूरÓ करार दिया था जबकि महिला टेनिस खिलाड़ी सेरेना विलियम्स ने कहा था कि अब तो हदें पार हो गईं। फुटबाल कोच एलेक्स ने इसे सरदर्द बताया था। बेल्जियम के 65 खिलाडिय़ों ने इसे कानूनी चुनौती दी थी। वाडा नियम को लेकर सबसे कड़ी टिप्पणी अमरीकी धावक लोलो जोंस और महिला विश्वकप स्कीइंग चैम्पियन ंिलंडसेवान ने की थी। फीफा और यूएफा ने इस साल मार्च में बैठक करके इसे नामंजूर कर दिया था जिसके बाद फुटबाल पर ओलंपिक खेलों से बाहर होने का खतरा मंडराने लगा था। यूरोपीय यूनियन के खेल आयुक्त जान फिजेल ने वाडा के इस नियम को हटाने के लिए कहा था जो एक जनवरी से लागू हो गया था। बहरहाल आईसीसी ने बीसीसीआई के साथ किसी भी तरह के टकराव का खंडन किया है और कहा है कि इसका व्यवहारिक और स्वीकार्य समाधान निकाला जाएगा। यदि ऐसा होता है तो यह खिलाड़ी और क्रिकेट दोनों के हित में है। वैसे भी डोपिंग एक समस्या है और इसे कतई बर्दाश्त नहीं कर सकते, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि खिलाडिय़ों की निजी जिंदगी प्रभावित हो। अच्छा होगा इस मुद्दे पर सर्वमान्य हल निकाला जाए ताकि बेवजह की छिड़ी बहस पर विराम लग सके।

राजनेताओं की ओछी राजनीति
कश्मीर की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। लेकिन इस बार की राजनीति जिस निचले स्तर पर हो रही है। उसे जायज नहीं ठहराया जा सकता। नेताओं ने सारी नैतिकता को ताक में रखकर विधानसभा में जिस तरह से एक-दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हैं वह न केवल सदन की मर्यादा के खिलाफ है बल्कि भारतीय संस्कृति व सभ्यता के भी प्रतिकूल है। इस तरह के व्यवहार को कदापि उचित नहीं ठहराया जा सकता। पीपुल्स डेमोक्रटिक पार्टी के नेता मुजफ्फर बेग ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर सैक्स कांड में शामिल होने का आरोप विधानसभा में लगाया, यह घटिया राजनीति का जीता-जागता उदाहरण है। पीडीपी यह कैसे भूल गई कि जब सैक्स कांड का खुलासा हुआ उस समय जम्मू-कश्मीर में उसकी सरकार थी। उसने इसका खुलासा उस समय क्यों नहीं किय। दरअसल यह सब एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा मालूम पड़ता है। वैसे भी यह मामला सीबीआई के सुपुर्द है और सीबीआई ने कभी भी इस मामले में उमर अब्दुल्ला के लिप्त होने की बात नहीं कही बावजूद पीडीपी का इस तरह विधानसभा में आरोप लगाना उसकी राजनैतिक हताशा को दर्शाता है। यह एक ऐसे व्यक्ति के दामन पर दाग लगाने का प्रयास है, जो उस प्रदेश का मुखिया है। उनके साथ लाखों-करोड़ों जनता की आस्था जुड़ी हुई है। ऐसे में पीडीपी को इस तरह का आरोप नहीं लगाना चाहिए था। लेकिन उमर अब्दुल्ला की तारीफ करनी चाहिए जिन्होंने इस आरोप के तुरंत बाद इस्तीफे की घोषणा कर उच्च नैतिक मापदंड का अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया है। लेकिन उनकी पार्टी के लोग भी पीडीपी की तरह ओछी राजनीति में उतर आए हैं। मुजफ्फर बेग के चरित्र पर ऐसे-ऐसे लांछन लगाए है, जो सारी शर्मो-हया को पीछे छोड़ दिया है। ऐसे में यह कहना कि सभी राजनति दल एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। सौ फीसदी सच है। जिनको जब समय मिलता है अपना भड़ास निकाल लेता है। उनको न तो कोई मर्यादा या तहजीब की चिंता है और न ही देश व समाज की संस्कृति व सभ्यता की। एक -दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ में राजनतिक नेता मनमानी में उतर आए है। उन्हें अब किसी का डर नहीं रहा है। देश के संविधान व कानून की इस तरह धज्जियां उड़ाते हैं मानो वह इनके रहमो करम पर हो, ऐसे राजनेताओं पर लगाम लगानी ही चाहिए। यह केवल कश्मीर का ही मामला नहीं है। कमोबेश देश के हर राज्यों में इस तरह की हरकत दिखाई देने लगी है। उत्तरप्रदेश, बिहार की विधानसभाओं में मारपीट की घटनाएं भी हो चुकी है। लेकिन कश्मीर में अभी जो कुछ भी हुआ है। वह भारतीय संविधान की मान्य परंपराओं के विपरीत है। ऐसी घटनाओं से बचा जाना चाहिए। देश की जनता अच्छा-बुरा सब समझती है और वक्त आने पर राजनेताओं को मजा जरूर चखाएगी। दरअसल इस सबके पीछए राजनीति का अपराधीकरण का भी बड़ा हाथ है। जब तक संसद व विधानसभाओं में गुंडे-बदमाश और भ्रष्टïाचारी आते रहेंगे लोकतंत्र की धज्जियां उड़ती रहेगी। अच्छा होगा इस रह की राजनीति करने वालों के लिए कानून बनाए जाए ताकि कोई भी इस तरह की हरकत करने की हिमाकत न कर पाएं।

No comments:

Post a Comment