Tuesday, August 18, 2009

आधा सच-आधा गप
जोर का झटका धीरे से

महंगाई के दर्द को झेल रही जनता के दर्दे-दिल को उस समय और जोर का झटका लगा जब प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने खराब मानसून का हवाला देते हुए आगे और महंगाई बढऩे का संकेत दे डाला। अब सुरसा के मुंह की तरह बढ़ रही इस महंगाई पर अंकुश लगे तो कैसे लगे? लेकिन सबसे अहम सवाल यह है कि आखिर इसके लिए दोषी कौन है? राज्य सरकार, केंद्र सरकार, जमाखोर, कालाबाजारी या कोई और...! हमारा तो मानना है कि इसके लिए जनता भी कम दोषी नहीं है। जब महंगाई इतनी बढ़ रही है तो इसे देख समझकर चीजों का इस्तेमाल करना चाहिए। जिनकी कीमतें भारी हैं उन्हें खाना ही क्यों? दाल, चीनी नहीं खाएंगे तो मर नहीं जाएंगे। जनता को तो दाल-चीनी लेने पर प्रतिबंध लगाने की मांग करनी चाहिए। वैसे भी भारत गांवों का देश है। कुल आबादी के 80 फीसदी लोग गांवों में ही रहते हैं और गांव वालों को तो 'नून-भातÓ से ही मतलब है। दाल-चीनी से उनका शायद ही वास्ता पड़ता होगा। खेत में कभी दाल की पैदावारी हो भी गई तो सीधे मंडी में बेच दिए जाते हैं। ऐसे में प्रतिबंध ही सबसे अच्छा उपाय है। 'न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरीÓ। पर उसे समझाए कौन? वह भी सरकार के सुर में सुर मिला रही है। मानसून को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। भला मानसून का इससे क्या वास्ता। वह तो अभी की बात है और ये महंगाई तो सालभर से लोगों का जीना मुहाल कर रखी है। ऐसे में सबसे अधिक दोषी कौन है? यह बताना मुश्किल है। इसके लिए या तो आयोग गठित करना चाहिए या फिर सीबीआई से जांच कराई जानी चाहिए ताकि दोषी कौन है? इसका पता चला सके। चूंकि हमारे देश में निष्पक्ष जांच के लिए ऐसे ही आयोग या सीबीआई जांच की मांग की जाती है, इसलिए यह जरूरी है। ताकि साल-दो साल का वक्त 'महंगाईÓ मामले में भी मिल सके। और वह अपना उल्लू सीधा कर सके। जब जांच रिपोर्ट आएगी तब 'दूध का दूध और पानी का पानी हो सकेगाÓ? पर यहां तो दूध और पानी दोनों से ही लोग जूझ रहे हैं। राष्टï्रीय राजधानी दिल्ली में जहां दूध के दाम फिर बढ़ा दिए हैं, वहीं इस भरी बरसात में पानी की किल्लत से लोगों को दो-चार होना पड़ रहा है और इसके लिए मानसून ही दोषी है। सचमुच मानसून रूठा हुआ है। लोगों ने उसे मनाने के लिए क्या-क्या नहीं किया। मेंढक-मेंढकी की शादी से लेकर हवन-यज्ञ तक किया और तो और छत्तीसगढ़ के कृषि मंत्री ने बकायदा भोले बाबा को जलाभिषेक किया लेकिन इंद्रदेव की नजरें इनायत ही नहीं हुई और होना भी नहीं चाहिए। जिस तरह से पर्यावरण का सत्यानाश किया गया है तो यह स्थिति तो आनी ही थी। कल की बजाए आज ही आ गई अब भगवान को याद करने से क्या फायदा। तुलसीदास ने रामायण में लिखा भी है। 'दुख में सुमिरन सब करै, सुख में करै न कोय, जो सुख में सुमिरन करै, तो दुख काहे को होयÓ सौ फीसदी सच है। आज सभी रामनाम की माला जप रहे हैं। यही काम पहले कर लिया होता तो इस तरह सूखे का यह दिन देखने को नहीं मिलता। अब बेवजह कभी मानसून को तो कभी भगवान को दोष देते अघा नहीं रहे। अच्छा होगा अपने अंतस में झांककर देखें। समस्याओं का खामियाजा तो जनता को ही भुगतना पड़ता है। नेताओं की चमड़ी तो मोटी होती है। उनको महंगाई, सूखे जैसी समस्याओं से कई लेना-देना नहीं है। यदि विपक्ष में बैठे हैं तो घडिय़ाली आंसू बहा लेते हैं। सत्तापक्ष के हों तो सिर पर हाथ फेर लेते हैं। हर चीज में राजनीति सूझती है। इसमें बुराई भी नहीं है। आखिर नेता बनते ही राजनीति करने के लिए हैं। लाखों-करोड़ों खर्च करने के बाद पद-प्रतिष्ठïा मिलती है। ऐसे में चमड़ी तो मोटी करनी ही होगी वरना ऐरे-गैरे भी पद प्रतिष्ठïा की दौड़ में शामिल हो जाएंगे।

आरक्षण ने हिलाए अंगदों के पाँव
एक बार फिर जनता-जर्नादन के दिन बहुरने वाले हैं। नगरीय निकाय चुनाव के लिए रणभेरी बजी भले ही न हो लेकिन आरक्षण की स्थिति स्पष्ट होते ही जहां दावेदारों में बेचैनी बढ़ गई है, वहीं आम जनता को एक बार फिर 'हरा ही हराÓ दिखने लगा है। चुनाव भले ही ठंड की ठिठुरन में होगा, लेकिन सावन की हरियाली उसे अभी से दिखने लगी है और दिखेगी भी क्यों नहीं पूरे पांच साल इसके लिए इंतजार जो किया है। लोकसभा-विधानसभा के चुनाव में तो जनता की पूछपरख नेताओं के चमचे सॉरी उनके पीए तक ही सीमित रह जाती है, लेकिन पंच-सरपंच और पार्षद-महापौर के चुनाव में जनता का उनसे सीधा संपर्क होता है, लिहाजा उनके लिए इससे अच्छा चांस और कुछ हो ही नहीं सकता। 'जो सोचे, सो पावैÓ की तर्ज पर वह अपनी सारी मुरादें इसी वक्त पूरा कर लेना चाहते हैं। यही वह समय होता है जब जनता वाकई में जनार्दन होती है और नेता याचक। यानी उनकी पांचों ऊंगलियां घी में होती है। सारी मुर्दें पूरी की जाती हैं और नहीं हुई तो फिर... भगवान जाने। ब्लैक मेलिंग से लेकर अनुनय विनय तक। क्या-क्या नहीं होते। नेता चाहे वह छोटा हो या बड़ा साम-दाम-दंड सारे भेद एक साथ प्रयोग करते हैं। लेकिन जो सफल हुआ उसकी चांदी बाकी की लुटिया डूबनी तय। अभी तक न तो चुनाव की घोषणा हुई है और न ही राजनीतिक पार्टियों में ऐसी कोई सुगबुगाहट है। प्रारंभिक प्रक्रिया प्रारंभ ही हुई है कि नेताओं की भुजाएं फड़कने लगी है। आरक्षण ने तो कई बड़े-बड़े धुरंधरों को ऐसी पटकनी दी है कि वह न घर का रहे न घाट का। फिर भी नए खुंटे की तलाश में जुट गए हैं। उनकी नजरें भटकने लगी हैं। यह दशा देख वर्षों से सपने संजोए बैठे लोगों की धड़कनें तेज हो गई हैं। उनका दिन का चैन और रात की नींद खराब होने लगी है। उठते-बैठते, सोते-जागते उन्हें यह डर सता रहा है कि कहीं वे तथाकथित बड़े नेता उनके क्षेत्र में न आ धमकें और यदि ऐसा हुआ तो फिर समझो उनका पत्ता साफ। लेकिन वे यह सोचकर मन मसोस रहा है कि 'दाने-दाने पर लिखा है, खाने वालों का नामÓ यदि हमारी किस्मत में लिखा होगा तो ये बड़़े नेताओं की क्या बिसात जो उनकी दावेदारी पर डाका डाल लें। खैर हमें क्या। हम तो सिर्फ देखने वाले हैं जो करना है उन्हीं लोगों को करना है। वार्ड पार्षद के आरक्षण के बाद का यह हाल है तो फिर महापौर का क्या होगा राम जाने। लेकिन अब इसके इंतजार की घडिय़ा भी खत्म हो गई हंै। अभी-अभी खबर मिली है कि महापौर के आरक्षण का भी पिटारा खुल गया है। राजधानी रायपुर का प्रथम नागरिक अब कोई महिला होंगी। राजनीतिक दलों में इस पर क्या रुख होगा वह तो अभी स्पष्ट नहीं हो सका है लेकिन अंदर ही अंदर यह मुद्दा सुलग रहा है। आरक्षण के पहले तक राजधानी में दावेदारों की बाढ़ आ गई थी। दोनों प्रमुख दलों के नेताओं के बीच वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई थी। भाजपा में वर्तमान महापौर के अलावा, सभापति, पूर्व सभापति व भाजयुमो अध्यक्ष के अलावा कई दावेदार ताल ठोंक रहे थे। अब उनकी उम्मीदों पर कुठाराघात हो गया है। इसी तरह कांग्रेस में कई दावेदार थे। विधायक तक महापौर बनने का ख्वाब देख रहे थे। लेकिन इस आरक्षण से दावादार सभी नेताओं को सांप सूंघ गया है। वे मौनी बाबा बन गए हंै। न तो कुछ निगलते बन रहा है न उगलते। यानी इसने उनके पैरों पर बेडिय़ा जड़ दी है। ठीक इसके उलट महिला नेत्रियों की चांदी ही चांदी हो गई है। उनके पैर अब जमीन पर नहीं पड़ रहे हैं। महापौर के सपने अब उनको हकीकत लगने लगे हैं। कई दावेदार अचानक सामने आने लगे हैं तो कई दमतार नेता अपनी जोरू को महापौर की टिकट दिलाने की जुगत में लग गए हंै। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि दोनों राजनीतिक पार्टियां किस पर दांव लगाएंगी और लाटरी किसकी लगेगी। जिसकी भी लाटरी लगे चाहे वह कांग्रेस की ओर से हो या फिर भाजपा की ओर से नफे में ही रहेंगे। चूंकि उनके साथ हार-जीत के साथ ही वर्चस्व का मामला भी जुड़ा होता है, लिहाजा टिकट पाना भी अपने-आप में बेहद अहम उपलब्धि माना जाता है और यही कारण है कि दावेदारों ने अभी से हाथ-पैर मारना शुरू कर दिया है। उनके दिलों की धुकधुकी अभी से बढ़ गई है। पार्टियां जंग जीतने की रणनीति बना रही हंै लेकिन आम जनता यानी मतदाता खुश हैं। उनके हाथों से नेताओं की तकदीर लिखने की शुभ घड़ी जो आने वाली है। कुछ को तो वे ठेंगा जरूर दिखाएंगे, जो पिछले 5 साल तक जनता को ठेंगा दिखाते रहे हैं तो कुछ के सिर पर ताज पहनाएंगे। बहरहाल एक बार फिर चुनावी पर्व का बेसब्री से इंतजार है ताकि महीने भर तक निश्चिंत होकर सारी सुख-सुविधाओं का भोग करने का शुभ अवसर मिल सके।

विशेष संपादकीय
जनशक्ति जागृत हो

देश को आजाद हुए 62 साल पूरे हो गए। आज ही के दिन 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ था। इसी की याद में हम सब भारतवासी प्रतिवर्ष इस दिन को राष्टï्रीय पर्व के रूप में मनाते हैं। आजादी कैसे मिली? इससे अब किसी को कोई मतलब नहीं रह गया है। राष्टï्रीय पर्व भी अब महज एक रस्म अदायगी हो गया है। नई पीढ़ी को इस पर्व की महत्ता नहीं मालूम। देश की आजादी के लिए प्राणों को न्यौछावर करने वाले वीर-शहीदों को भूल गए हैं जिनकी बदौलत हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं। आंदोलनों, सत्याग्रह, त्याग और बलिदान की गाथाएं इतिहास का हिस्सा बन चुकी हैं, उसे नई पीढ़ी को बताए जाने की जरूरत है ताकि वह आजादी के मर्म को समझ सकें। वरना उनके लिए यह सिर्फ जश्न मनाने का दिन बनकर रह जाएगा। हर वर्ष समरोह होता है, लेकिन वह सिर्फ यहीं तक सीमित न रहे। इसके आगे भी बहुत-कुछ है। हमेशा ऐसे अवसरों पर राजनेताओं द्वारा बड़ी-बड़ी बातें कही जाती हैं। कई योजनाओं की घोषणा की जाती है लेकिन इससे कुछ भी हासिल नहीं होने वाला। जब तक प्रत्येक व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों को समझकर कत्र्तव्यों का पालन देश के लिए नहीं करेगा तब तक हम अपने उद्देश्यों पर सफल नहीं हो सकेंगे।आजादी के इन 62 वर्षों में हमने 'क्या खोया-क्या पायाÓ यह एक बड़ा सवाल है। दिखने में तो लगता है कि हमने बहुत कुछ पाया है, लेकिन जो खोया है उसकी भरपाई कैसे होगी यह विचारणीय है। आज थल, जल और नभ तीनों क्षेत्रों में हमने कई ऐतिहासिक व गौरवशाली उपलब्धियां हासिल की हैं। परमाणु शक्ति संपन्न राष्टï्र होने के साथ ही हमने अग्नि, पृथ्वी जैसे घातक मिसाइलें तैयार किए हैं जो दुश्मनों के छक्के छुड़ाने में सक्षम है। समुद्र की गहराई नापने के साथ उस पर 5 कि.मी. लंबी पुल का भी निर्माण किया है। चंद्रमा में उपग्रह भेजकर पूरे विश्व को बता दिया कि भारत व भारत के नागरिक हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं। अब वह दिन दूर नहीं जब चंद्रमा पर हम स्वतंत्र रूप से कदम रख सकेंगे। बावजूद इसके कुछ ऐसी कमियां हैं, जिसे दूर नहीं किया गया तो देश में अराजकता का माहौल पैदा हो जाएगा। नैतिक व चारित्रिक पतन के अलावा इन 62 वर्षों में सांप्रदायिकता, जातिवाद व संकीर्णता इस कदर हावी हो गई है कि लोग आपस में एक-दूसरे से ऐसा व्यवहार करने लगे हैं मानों वे एक देश के निवासी नहीं हैं। जातिवाद समाज की समरसता और सामंजस्य में जहर घोल रहा है। समाज में सामाजिक तथा आर्थिक विषमताओं के चलते फूट डालने वाले तत्व सक्रिय हो गए हैं। जब तक इन विषमताओं को खत्म करने की दिशा में कदम नहीं उठेंगे तब तक ऐसे तत्व राज करते रहेंगे। इसके लिए जनता को आगे आना होगा। राजनीतिक दलों की भी इसमें भागीदारी होनी चाहिए ताकि गरीब-अमीर, अगड़ा-पिछड़ा का भेदभाव खत्म करने के प्रयास हो सके। सबसे बड़ी कमजोरी आज राजनीतिक दलों में देखी जा रही है। सत्ता भ्रष्टïाचार का सबसे बड़ा केन्द्र बनी हुई है। राजनीति कभी सेवा का माध्यम हुआ करती थी आज सत्ता हथियाने का साधन बनी हुई है। सत्ता तो सेवा के लिए होना चाहिए लेकिन उसे भोग की वस्तु बना दी गई है। राजनीति से ही सारी बुराइयां फैल रही हैं। देशवासियों का खुलकर शोषण-दोहन किया जा रहा है। ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक बाहुबल और धनबल का बोलबाला दिखने लगा है। जबकि देश का भाग्यविधाता मौन साधे बैठा हुआ है या यूं कहें कि वह सहन कर रहा है। हिंदुस्तान को यदि हिंदुस्तान रहने दिया जाए तो सब-कुछ ठीक हो जाएगा लेकिन कुछ ऐसे लोग हैं जो यह नहीं चाहते। दरअसल भ्रष्टïाचार ने सारी प्रगति को चाहे वह विचारों, सिद्धांतों या नीतियों की ही क्यों न हो जकड़ लिया है। जब तक इस जकडऩ को तोड़ा नहीं जाएगा तब तक सफलता नहीं मिलेगी।वर्तमान में केन्द्र में यूपीए सरकार ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाई है। जनता का उसे भरपूर स्नेह मिला है। लेकिन महंगाई व सूखा उसके लिए एक बड़ी चुनौती है। दूसरी बार सत्ता संभालने वाले अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह इससे कैसे निपटेंगे यह अहम सवाल है। ठीक इसी तरह नवोदित राज्य छत्तीसगढ़ में लगातार दूसरी बार सत्ता संभालने वाले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को चौतरफा चुनौतियाँ मिल रही हैं। महंगाई, सूखे के साथ नक्सलवाद एक गंभीर समस्या है। प्रदेश के लिए नासूर बन चुकी इस समस्या से निपटना राज्य सरकार की पहली प्राथमिकता होगी। इसके लिए प्रदेश के साथ-साथ केन्द्र सरकार ने भी हर तरह से सहायता देने का ऐलान किया है।अंत में हम कहना चाहते हैं कि आजादी के इन 62 सालों में देश ने जितना पाया है उतना खोया भी है। स्वतंत्रता का लाभ अभी तक देश के सुदूर क्षेत्रों में नहीं पहुंच पाया है। राजनीति के काले धुएं ने सबको अंधेरे में रखा है जब तक इसे हटाया नहीं जाएगा तब तक इसका लाभ सभी तक नहीं पहुंच पाएगा। इसके लिए सभी को आगे आना होगा। जाति, धर्म, संप्रदाय को परे रखकर जनशक्ति को जागृत होना होगा। साथ ही यह भावना जरूर रहे कि देश देशवासियों का है। स्वतंत्रता से ही हमारी आन-बान-शान है। इसे किसी भी तरह से आंच न आने दें यह संकल्प लें।

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