अच्छा सिला दिया तूने...!
बेचारे जसवंत। 'न घर के रहे न घाट केÓ। जिन्ना का जिन इस कदर हावी हो गया है कि वह पीछा छोडऩे का नाम ही नहीं ले रहा है। क्या पता था कि जिन्ना की एक तारीफ उन्हें विरह की तपिश झेलने को मजबूर कर देगी। दूसरी पार्टियां (भाजपा को छोड़कर) तो पीछे पड़ी ही थीं अब अपनी पार्टी ने भी दामन झटक लिया। उन्हें सपने में भी यह उम्मीद नहीं थी कि जिनका 30 वर्षों का साथ था वह एक झटके में ही उनसे किनारा कर लेंगे। उन्हें लगा था कि जब आडवाणी जिन्ना की मजार पर जाकर नतमस्तक हो सकते हैं। उनकी तारीफों में कसीदे गढ़ सकते हैं तो मैं क्यों नहीं? लेकिन उन्हें पता होना चाहिए था कि आडवाणी और जसवंत में जमीन-आसमान का अंतर है। आडवाणी लौह पुरुष जो ठहरे और जसवंत...। खैर जो भी हो लेकिन जसवंत ने भाजपा के लिए क्या-क्या नहीं किया। बदले में उन्हें यह सिला दिया..। कभी उन्हें पार्टी का हनुमान कहा जाता था, एक झटके में रावण बना दिया। वैसे यह कोई नई बात नहीं है। सभी पार्टियों में इस तरह की उठा-पटक होती है। अपना वर्चस्व बनाए रखने दूसरे के पर कतरना जरूरी होता है, लेकिन यहां तो पर नहीं पार्टी से ही परे कर दिया गया। जब से अटलबिहारी वाजपेयी ने सक्रिय राजनीति से संन्यास लिया है तब से उनके चहेतों को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है। जसवंत भी इसके शिकार हो गए। जब दूसरों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है तो फिर जसवंत कैसे बचते? उनके साथ तो ऐसा होना ही था। इंजार था तो सिर्फ सही मौकों का और यह मौका 'जिन्नाÓ ने दे दिया। फिर क्या 'बिल्ली के भाग्य से छींका टूटाÓ वाली कहावत चरितार्थ हो गई। न नोटिस, न निलंबन सीधी कार्रवाई। इसे कहते हैं अनुशासन का डंडा। इसी बहाने औरों को भी संदेश दे दिया गया। कभी आडवाणी पर भी 'जिन्नाÓ का भूत सवार था लेकिन उनसे अध्यक्षीय पद छीनकर लगाम लगाने की कोशिश की गई थी। जसवंत सिंह के साथ जो हुआ उससे सभी अचंभित हैं। ऊपर से 5 साल की मेहनत के बाद जो किताब जिन्ना पर लिखी थी उस पर भी प्रतिबंध ठोंक दिया। यह तो दुबले पर दो आषाढ़ वाली स्थिति हो गई। पार्टी से अलग कर दें यह ठीक है, लेकिन किताब पर प्रतिबंध लगाकर उसने लाखों करोड़ों लोगों को उसे पढऩे से वंचित कर दिया। यह तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रहार है। भाजपा सदैव स्वतंत्रता की बात करती है फिर यह क्या? लगता है भाजपा जसवंत पर पूरे तीस साल का खुन्नस एक ही बार में उतार लेना चाहती है। लेकिन जसवंत को मायूस होने या डरने की जरूरत नहीं है। अब देश में ही नहीं विदेशों में भी उनके जख्मों पर मरहम लगाने वालों की कमी नहीं है। भाजपा ने भले ही उन्हें 'दूध से मक्खी की तरहÓ निकाल बाहर कर दिया हो लेकिन कई ऐसे दल या संगठन हैं, जो उनके विचारों से इत्तफाक रखते हैं। पाकिस्तान में तो जसवंत सिंह की जय-जयकार हो रही है और होना भी चाहिए। आखिर जसवंत ने कौन सा गुनाह कर डाला है? जिन्ना को महान ही तो बताया है। महान बताना क्या गुनाह है? जो काम कांग्रेस को करना चाहिए था उसे भाजपा ने करके 'अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार लीÓ। जसवंत ने नेहरू को विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराया है, लिहाजा कांग्रेस ने आपत्ति जताई थी। उसने पुस्तक में लिखी गई बातों को खारिज किया था लेकिन भाजपा ने तो जसवंत को ही खारिज कर दिया। अल्पसंख्यक वर्ग को अपने पक्ष में करने का एक बढिय़ा मौका खो दिया। खैर। इससे हमें कोई लेना देना नहीं है। यह उसका अंदरूनी मामला है। फिर भी भाजपा के हाव-भाव व क्रियाकलापों को देखने से लगता है कि अब उसमें भी निष्ठïा व नैतिक मूल्यों की कोई कीमत नहीं रह गई है तभी तो हमेशा राम के साथ रहने वाले 'हनुमानÓ को राम से ही अलग करने का प्रपंच रच डाला। उन्हें वनवास भेज दिया। इसे ही करते हैं कलियुग। यहां सब कुछ संभव है और इसे भाजपा ने कर दिखाया है।
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