Tuesday, August 4, 2009

'ऊँगली कटाकर शहीद होने की चाहतÓ


'ऊँगली कटाकर शहीद होने की चाहतÓ
देश में इन दिनों पक्ष-विपक्ष के बीच धींगा-मस्ती का खेल चल रहा है। दोनों अपने में मस्त हैं। न तो आम जनता का ख्याल है और न ही देश के मान-सम्मान और साख का। सरकार ब्लूचिस्तान मामले से पल्ला झाडऩे का प्रयास कर रही है तो विपक्ष उसे घेरने पर आमादा है, लेकिन इन सबके बीच भी और कई ऐसे मुद्दे हैं, जिस पर किसी का ध्यान नहीं है और यही वजह है कि दोनों आम जनता से दूर होते जा रहे हैं। आम जनता का ख्याल किसी को नहीं है। उसे तो कौडिय़ों के मोल समझा जाता है और समझना भी चाहिए। आखिर उसकी बखत ही क्या है। वह कभी सुधर भी नहीं सकती। उनका काम सिर्फ और सिर्फ चिल्लाना है। इसके अलावा वह कुछ कर भी नहीं सकती। यह उनकी आदत हो चुकी है और सभी इसे जान-समझ चुके हैं, लिहाजा उसके चिल्लाने से किसी के कानों में जूं तक नहीं रेंगती। आजकल महंगाई को लेकर वह कितना चिल्ला रही है। हाय-तौबा मचा रही है लेकिन फायदा क्या? कुछ भी नहीं। ऊपर से महंगाई सप्ताह दर सप्ताह बढ़ती ही जा रही है। इससे तो अच्छा होता कि चुप रहती। वैसे भी चुप रहने में ही समझदारी होती है। वह तो बेचारी है ही। आखिरकार वह थक हारकर चुप बैठ ही जाती है लेकिन इन दिनों ब्लूचिस्तान को लेकर जिस तरह से संसद के अंदर और बाहर नूरा-कुश्ती जारी है। उसे देखते हुए उसका चुप रहना उचित नहीं है। दरअसल प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का मिस्र के शर्म अल शेख शहर में पाक प्रधानमंत्री गिलानी के साथ भेंट के बाद जो साझा बयान जारी किया गया था उसे लेकर ही यह सारा बवाल मचा हुआ है। हालांकि सरकार इसे एक पक्षीय बताकर उससे पल्ला झाडऩे का प्रयास कर रही है लेकिन मामला गंभीर है। मुंबई हमलों के बाद आतंकवाद को जड़-मूल से खत्म करने के लिए प्रधानमंत्री प्रतिबद्ध थे। उनकी सरकार ने पाकिस्तान पर राजनीतिक और कूटनीतिक दबाव डालकर उसे यह स्वीकार करने पर मजबूर किया था कि मुंबई के हमलावर पाकिस्तानी थे और हमले की साजिश पाकिस्तान में ही रची गई थी। अंतर्राष्टï्रीय समुदाय के बीच भी वह अलग-थलग पड़ा था। भारत हमलावरों पर कार्रवाई और पाकिस्तान में आतंकवादी ढांचा तहस-नहस किए बिना उसके साथ कोई संबंध रखने को तैयार नहीं था लेकिन अचानक वार्ता की शुरूआत कर दी गई। यह सब क्यों? न तो पाकिस्तान ने अपने वादों को निभाया है और न ही भारत की शर्तें मानी है। फिर भी इतनी दयालुता? यह समझ से परे है। वैसे सरकार संसद पर हमले और कारगिल युद्ध के बाद भी दो बार पाकिस्तान से वार्ता नहीं करने का ऐलान करने के चंद महीनों बाद ही वार्ता की मेज पर जाने का पराक्रम कर चुकी है। इसलिए उसमें आश्चर्य की जरूरत नहीं थी। लेकिन विपक्ष को कौन समझाए वह तो हाथ-मुंह धोकर ऐसे पीछे पड़ गया है कि उसे इसके अलावा कोई दूसरा मुद्दा ही नहीं दिख रहा है। ठीक है यह देश की सुरक्षा से जुड़ा मसला है लेकिन इसकी जिम्मेदारी तो सरकार की है बेवजह वह बात का बतंगड़ बनाने पर तुला हुआ है। वह अब देश की साख और सुरक्षा का झंडा बुलंद करना चाह रहा है। लगता है 'ऊंगली काटकर शहीद होनेÓ वाली कहावत को चरितार्थ करना चाह रहा है। खैर! हमें क्या यह तो विपक्ष जाने पर जनता को भी अपनी जिम्मेदारी निभाने आगे आना चाहिए। कब तक वह 'बेचारीÓ रहेगी। अब तक तो राजनेता इसी का फायदा उठाते रहे हैं। इसी का नतीजा है कि आज दाल और आलू-प्याज जैसी आमजन की सब्जियां भी थाली से दूर होने लगी हैं। जमाखोरी, कालाबाजारी व कमीशनखोरी के चंगुल से जब तक निजात नहीं मिलेगी यह स्थिति बनी रहेगी।
नैतिक साहस दिखाएं बूटा
राजनीति जनसेवा का साधनÓ है यह एक शाश्वत सत्य है, लेकिन आज कितने राजनेता हैं, जो इस शाश्वत सत्य पर चल रहे हैं, ऐसे नेताओं को अंगुली पर गिने जा सकते है। राजनीति आज अपने मूल उद्देश्यों से भटक चुकी है और इसका जीता-जागता उदाहरण राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष बूटा सिंह हैं, जो दामन पर दाग लगने के बावजूद पद छोडऩे को तैयार नहीं है। मामला उनके बेटे से जुड़ा हुआ है। उनका बेटा सरबजीत उर्फ स्वीटी एक करोड़ रुपए की रिश्वतखोरी के आरोप में सीबीआई की हिरासत में है। रिश्वत के एवज में मामला रफा-दफा करने का आश्वासन राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग से संबंधित है इसलिए इसे बूटा सिंह से जोड़कर देखा जा रहा है। बावजूद बूटा सिंह नैतिकता को दरकिनार कर इस्तीफा देने को तैयार नहीं है। बल्कि वे इसे एक राजनीतिक षडयंत्र बताते हुए इसे अपने स्तर पर सुलझाने में लगे हैं। उन्होंने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री से बात करने के अलावा आवश्यक दस्तावेज फैक्स करने की बात कही है। उन्होंने सीबीआई के रवैये पर भी सवाल खड़ा किया और कहा कि मेरे बेटे और मुझे निशाना बनाया जा रहा है। बूटा सिंह की बात अपनी जगह सच हो सकती है, लेकिन उन्हें चाहिए कि वे नैतिकता के नाते पद से इस्तीफा देकर कानूनी लड़ाई लड़े और जनता को वास्तविकता से रूबरू कराए। आखिर वे पद क्यों नहीं छोडऩा चाहते? यह सच्चाई सामने लाने का सर्वोत्तम तरीका है। लेकिन वे ऐसा नहीं कर रहे। इसे क्या कहा जाए। निश्चित रूप से यह राजनीति के गिरते स्तर का द्योतक है। वैसे बूटा सिंह कोई पहले व्यक्ति नहीं हैं, जो इस तरह की बातें कह रहे हैं। कई ऐसे राजनेता भी हुए हैं, जो इस्तीफा देने से कतराते रहे हैं। निश्चित रूप से यदि राजनीति को सेवा का माध्यम बनाना है तो सार्वजनिक जीवन में नैतिकता और शुचिता जैसे उच्च मापदंडों को पुनस्र्थापित करना होगा। चूंकि बूटा सिंह आज संवैधानिक पद पर आसीन हैं, वे देश के गृहमंत्री भी रह चुके हैं, इसलिए यह और भी महत्वपूर्ण हो गया है कि वे इस मुद्दे पर कोई शीघ्र निर्णय लें। वैसे देश में कई राजनीतिज्ञ ऐसे भी हुए हैं, जिन्होंने उच्च नैतिक मापदंड को बनाए रखा है। अभी हाल ही में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने पीडीपी के आरोप पर विधानसभा में इस्तीफे की घोषणा कर नैतिकता की उच्च परंपरा को और पुष्ठï किया है। यह सच है कि राजनीति में पारदर्शिता अब बीते दिनों की बात हो गई है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि नैतिकता को तिलांजलि दे दी जाए। अच्छा होगा बूटा सिंह इस्तीफा देकर नैतिकता के उच्च प्रतिमानों के शिखर पर अपने आपको स्थापित कर लें। यह उनके लिए एक अच्छा अवसर है। सच्चाई सामने आ ही जाएगी।

5 comments:

  1. भाई यहां तो राजनीति बस पैसा बटरोने का साधन है, इनका जनता से कोई वास्ता नही होता। मुद्दा गंभीर उठाया है आपने, अच्छा लेख। बस ऐसे ही लिखते रहिये।

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  2. welcome to this new world,
    My best wishes and good luck.
    Keep writing, your article is good and thoughtful.
    Dr.Bhoopendra

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  3. मुझे आपके इस सुन्‍दर से ब्‍लाग को देखने का अवसर मिला, नाम के अनुरूप बहुत ही खूबसूरती के साथ आपने इन्‍हें प्रस्‍तुत किया आभार् !!

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